629 तारीखों और करीब सात साल बाद मिला इंसाफ, आदित्य हत्याकांड में 14 दोषियों को उम्रकैद

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रायबरेली। इकलौते भाई आदित्य प्रताप सिंह की हत्या के बाद न्याय की लड़ाई लड़ रही बहन रुचि सिंह को आखिरकार करीब सात साल बाद इंसाफ मिल गया। 629 तारीखों तक चली लंबी कानूनी लड़ाई के बाद जिला जज न्यायालय ने मंगलवार को आदित्य हत्याकांड में 14 दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। वहीं, दो आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में अदालत ने बरी कर दिया। फैसला सुनाए जाने के दौरान कोर्ट परिसर में सुरक्षा के कड़े इंतजाम रहे।

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आदित्य प्रताप सिंह की हत्या 9 अक्तूबर 2019 को महराजगंज कोतवाली क्षेत्र के रतापुर स्थित सोमू ढाबे में हुई थी। अगले दिन 10 अक्तूबर 2019 को उनका शव हरचंदपुर थाना क्षेत्र के गढ़ी खास गांव के पास महराजगंज रोड पर मिला था। मामले में पुलिस की शुरुआती कार्रवाई पर भी सवाल उठे थे। तत्कालीन पुलिस अधीक्षक शशिशेखर सिंह को पद से हटा दिया गया था, जबकि चार पुलिसकर्मियों को निलंबित किया गया था।

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हत्या के समय आदित्य की बहन रुचि सिंह जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में बीए की पढ़ाई कर रही थीं। परिवार के मुताबिक, आरोपियों के प्रभाव और आर्थिक स्थिति के बावजूद रुचि ने हार नहीं मानी और भाई को न्याय दिलाने के लिए खुद मोर्चा संभाला।

रुचि की शादी दो वर्ष पहले आगरा में हुई थी, लेकिन भाई की हत्या के मामले में न्याय की लड़ाई के लिए वह मायके में ही रहीं। इस दौरान उन्हें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा। मामले में न्याय की मांग को लेकर उन्होंने लगातार पैरवी की और अदालत में सुनवाई को आगे बढ़ाने के लिए प्रयास करती रहीं।

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न्याय की यह लड़ाई रुचि के लिए बेहद दर्दनाक रही। 30 जुलाई 2026 को अदालत में मामले में फैसला सुनाया जाना प्रस्तावित था। उस समय रुचि गर्भवती थीं और लगातार भागदौड़ के चलते उनकी तबीयत बिगड़ गई। उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। इसी दौरान गर्भ में पल रहे उनके बच्चे की मौत हो गई।

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बच्चे को खोने का असहनीय दर्द भी रुचि को न्याय की लड़ाई से पीछे नहीं हटा सका। 30 जुलाई को फैसला टलने के बाद अदालत ने 18 अगस्त 2026 की तारीख निर्धारित की। मंगलवार को जैसे ही अदालत ने 14 दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई, रुचि की आंखों से आंसू छलक पड़े। यह आंसू वर्षों के संघर्ष और आखिरकार मिले न्याय की गवाही दे रहे थे।

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रुचि के मुताबिक, 20 जनवरी 2020 को जिला जज न्यायालय में मामले की पहली सुनवाई हुई थी। बाद में मामला एडीजे प्रथम की अदालत में भेज दिया गया। इसके बाद हाईकोर्ट के आदेश के तहत जिला जज द्वारा मामले की प्रतिदिन सुनवाई किए जाने का निर्णय हुआ। इसके बाद मुकदमे की सुनवाई में तेजी आई।

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मामले में कुल 13 गवाहों को अदालत में पेश किया गया। जुलाई में डीबीआर को लेकर विवाद के बाद शासकीय अधिवक्ता विवेक सिंह राठौर को इस मामले से हटाकर वरिष्ठ अधिवक्ता सुरेश प्रताप सिंह को विशेष अभियोजक नियुक्त किया गया था।

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मंगलवार दोपहर करीब दो बजे आदित्य हत्याकांड के दोषियों को सजा सुनाई जानी थी। करीब सवा दो बजे सभी दोषियों को कड़ी सुरक्षा के बीच अदालत में पेश किया गया। सजा सुनाए जाने से पहले दोषियों और उनके परिजनों के चेहरों पर तनाव साफ नजर आया।

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कुछ देर की कार्यवाही के बाद अदालत ने 14 दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। सजा के बाद दोषियों को कड़ी सुरक्षा के बीच अदालत परिसर से बाहर निकालकर पुलिस वाहन तक पहुंचाया गया।

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कोर्ट परिसर में पहले से ही भारी पुलिस बल तैनात किया गया था। फैसले के बाद परिसर में मौजूद लोगों के बीच मामले को लेकर चर्चा होती रही। कई लोगों ने कहा कि लंबे संघर्ष के बाद आखिरकार न्याय हुआ।

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दो आरोपी साक्ष्य के अभाव में बरी

आदित्य की बहन रुचि सिंह ने बताया कि अदालत ने आरके यादव और अभितेज सिंह को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया। रुचि का आरोप था कि इन्हीं दोनों ने स्कॉर्पियो से उनके भाई का पीछा किया था। हालांकि अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर दोनों को दोषमुक्त कर दिया।

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रुचि ने 14 दोषियों को सजा मिलने पर संतोष जताया और कहा कि उन्हें लंबी लड़ाई के बाद न्याय मिला है। उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भूमिका का भी उल्लेख करते हुए कहा कि सरकार के स्तर से मामले को गंभीरता से लिए जाने से उन्हें न्याय की लड़ाई लड़ने में मदद मिली और उन्हें सुरक्षा भी उपलब्ध कराई गई।

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मामले के शुरुआती दौर में पुलिस की लापरवाही के आरोप सामने आए थे। कार्रवाई के तहत तत्कालीन पुलिस अधीक्षक शशिशेखर सिंह को पद से हटा दिया गया था। इसके अलावा चार पुलिसकर्मियों को निलंबित किया गया था।

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बाद में पुलिस ने विवेचना पूरी कर 25 दिसंबर 2019 को आरोपपत्र अदालत में दाखिल किया। इसके बाद न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ी और वर्षों तक अलग-अलग तारीखों पर सुनवाई चलती रही।

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सात साल की लड़ाई का आखिरी पड़ाव

आदित्य की हत्या से लेकर दोषियों को सजा मिलने तक का सफर करीब सात वर्ष का रहा। इस दौरान परिवार को लगातार अदालत के चक्कर लगाने पड़े। बहन रुचि सिंह ने अपने भाई के लिए न्याय की लड़ाई को अपनी जिंदगी का मिशन बना लिया। इस संघर्ष में उन्होंने अपने बच्चे को भी खो दिया, लेकिन न्याय की उम्मीद नहीं छोड़ी।

घटनाक्रम

  • 9 अक्तूबर 2019: रतापुर स्थित सोमू ढाबे में आदित्य प्रताप सिंह की हत्या।
  • – 10 अक्तूबर 2019: गढ़ी खास गांव के पास शव बरामद।
  • – 25 दिसंबर 2019: पुलिस ने अदालत में आरोपपत्र दाखिल किया।
  • – 20 जनवरी 2020: जिला जज न्यायालय में मामले की पहली सुनवाई।
  • जुलाई 2026: डीबीआर विवाद के बाद विशेष अभियोजक की नियुक्ति
  • 30 जुलाई 2026: फैसला सुनाया जाना था, लेकिन रुचि की तबीयत बिगड़ने और अस्पताल में भर्ती होने के कारण फैसला टला।
  • 18 अगस्त 2026: जिला जज न्यायालय ने 14 दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई, जबकि दो आरोपी साक्ष्य के अभाव में बरी हुए।

 

629 तारीखों, करीब सात साल के इंतजार और व्यक्तिगत त्रासदियों के बीच चली यह कानूनी लड़ाई अब सजा के फैसले के साथ अपने महत्वपूर्ण पड़ाव पर पहुंच गई है। आदित्य के परिवार के लिए यह फैसला केवल अदालत का निर्णय नहीं, बल्कि वर्षों से चले आ रहे संघर्ष के बाद मिला इंसाफ है।

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