नई दिल्ली। जिस राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) पर देश के लाखों युवाओं के भविष्य की जिम्मेदारी है, उसी की परीक्षा व्यवस्था एक बार फिर कठघरे में है। NEET से जुड़े विवादों के बाद अब UGC-NET जून 2026 के अंग्रेजी, कॉमर्स और समाजशास्त्र के प्रश्नपत्रों में इतनी गड़बड़ियां सामने आईं कि NTA को तीनों विषयों की परीक्षा दोबारा कराने का फैसला लेना पड़ा।
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NTA ने बताया कि इन प्रश्नपत्रों में तथ्यात्मक, टाइपिंग, अनुवाद और भाषा संबंधी कई त्रुटियां मिलीं। शिकायतों की जांच के लिए गठित समिति की सिफारिश के बाद दोबारा परीक्षा कराने का निर्णय लिया गया। अंग्रेजी और कॉमर्स की परीक्षा 9 सितंबर, जबकि समाजशास्त्र की परीक्षा 10 सितंबर 2026 को होगी। अभ्यर्थियों से दोबारा परीक्षा के लिए कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं लिया जाएगा।
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सवाल सिर्फ गलत सवालों का नहीं, पूरी व्यवस्था का है
यह महज एक-दो प्रश्नों की गलती नहीं है। सवाल यह है कि जिस परीक्षा के जरिए JRF, असिस्टेंट प्रोफेसर और PhD प्रवेश जैसी अकादमिक राह तय होती है, उसके प्रश्नपत्र तैयार होने से पहले उनका बुनियादी स्तर पर सत्यापन आखिर किसने किया?
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नाम गलत, किताबों के शीर्षक गलत, अनुवाद गलत, व्याकरण गलत—तो फिर परीक्षा लेने की इतनी जल्दबाजी क्यों?
अभ्यर्थी महीनों तैयारी करते हैं। हजारों रुपये कोचिंग, किताबों, यात्रा और रहने पर खर्च करते हैं। परीक्षा के दिन अपनी मेहनत के साथ सेंटर पहुंचते हैं और बाद में पता चलता है कि प्रश्नपत्र में ही गंभीर खामियां थीं।
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NEET के बाद फिर वही सवाल—NTA पर भरोसा कैसे करें?https://www.instagram.com/reel/DcEdtA1BqnI/?igsh=bXRpM3hidjNkdDJ4&igsi=bXRpM3hidjNkdDJ4
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NTA पहले भी परीक्षा संबंधी विवादों को लेकर सवालों के घेरे में रही है। अब UGC-NET के तीन पेपर दोबारा कराने की नौबत ने उन सवालों को फिर जिंदा कर दिया है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या NTA के पास प्रश्नपत्रों की गुणवत्ता जांचने की पर्याप्त और मजबूत व्यवस्था है?
अगर है, तो इतनी बुनियादी गलतियां परीक्षा हॉल तक कैसे पहुंचीं?
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और अगर नहीं है, तो देश के सबसे महत्वपूर्ण प्रतियोगी और पात्रता परीक्षाओं की जिम्मेदारी संभालने वाली संस्था से जवाबदेही कौन मांगेगा?
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अभ्यर्थियों को सिर्फ री-एग्जाम की तारीख नहीं चाहिए। उन्हें यह जवाब भी चाहिए कि गलती हुई कैसे, जिम्मेदार कौन है और अगली बार ऐसी गलती रोकने की गारंटी क्या है।
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क्योंकि परीक्षा दोबारा कराना समाधान हो सकता है, लेकिन हर बार युवाओं के भविष्य को प्रयोगशाला बनाना व्यवस्था का समाधान नहीं हो सकता।





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