जिला अस्पताल की पर्ची, बाहर की दवा और ‘सब्स्टिट्यूट’ का खेल!

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  • मरीज को लिखी दवा की जगह दूसरा ब्रांड देने पर मेडिकल स्टोर संचालक को फटकार, कथित कमीशन के खेल पर उठे गंभीर सवाल

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जिला अस्पताल से मरीज को लिखी गई बाहर की दवा और उसके बाद मेडिकल स्टोर पर हुए कथित ‘सब्स्टिट्यूट’ के खेल ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला जिला अस्पताल के बाहर स्थित लाइफ केयर मेडिकल स्टोर से जुड़ा बताया जा रहा है, जहां मरीज को डॉक्टर द्वारा लिखी गई दवा के बजाय उसका दूसरा विकल्प दिए जाने का आरोप है।

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मामला तब गरमा गया जब मरीज वही दवा लेकर डॉक्टर के पास पहुंचा। आरोप है कि डॉक्टर ने दवा देखते ही कथित तौर पर पहचान लिया कि मरीज को पर्चे पर लिखी गई दवा नहीं दी गई है। इसके बाद मेडिकल स्टोर संचालक को कथित रूप से चेतावनी दी गई कि मरीजों को पर्चे पर लिखी गई दवा ही उपलब्ध कराई जाए और उसकी जगह कोई दूसरा ब्रांड न दिया जाए।

यहीं से कहानी सिर्फ ‘दवा बदलने’ तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सवाल उठता है कि अगर डॉक्टर द्वारा किसी खास ब्रांड की दवा लिखी जा रही है तो उसके पीछे वजह क्या है? क्या मरीज की जरूरत के मुताबिक दवा लिखी जा रही है या किसी खास ब्रांड को प्राथमिकता देने का कोई और गणित है?

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मामले में सामने आई बातचीत में कथित तौर पर मेडिकल स्टोर संचालक और मनीष नामक व्यक्ति, जिसे संबंधित दवाओं का काम देखने वाला बताया जा रहा है, के बीच बातचीत का जिक्र है। बातचीत में कमीशन और डॉक्टर द्वारा लिखी जाने वाली दवाओं को लेकर कथित तौर पर गंभीर बातें सामने आती हैं। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है।

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सबसे बड़ा सवाल यह है कि मरीज को डॉक्टर ने जो दवा लिखी, वही दवा क्यों दी जानी चाहिए—क्या इसलिए कि वह चिकित्सकीय रूप से जरूरी है, या इसलिए कि उसके पीछे किसी तरह का व्यावसायिक हित जुड़ा है?

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अगर डॉक्टर किसी खास कंपनी या ब्रांड की दवा केवल कथित कमीशन के लिए लिखते हैं और मेडिकल स्टोर से मरीज को वही दवा खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है, तो यह सीधे तौर पर मरीज की जेब और स्वास्थ्य दोनों से जुड़ा गंभीर सवाल बन जाता है। दूसरी तरफ, यदि मेडिकल स्टोर संचालक डॉक्टर की लिखी दवा के स्थान पर अपनी सुविधा या मार्जिन के हिसाब से दूसरा ब्रांड देता है, तो उसकी भी जवाबदेही तय होनी चाहिए।

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दवा मरीज के इलाज का हिस्सा है, कमीशन की चेन का नहीं।https://www.facebook.com/share/r/199YSWSkFu/

इस पूरे मामले में स्वास्थ्य विभाग और अस्पताल प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि जिला अस्पताल के डॉक्टर बाहर की दवाएं किस आधार पर लिखते हैं, क्या किसी खास ब्रांड को लिखने का कोई दबाव या आर्थिक हित जुड़ा है और मेडिकल स्टोरों पर लिखी गई दवाओं की बिक्री को लेकर क्या निगरानी व्यवस्था है। https://www.facebook.com/share/r/1D3MUehG7S/

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मरीज बीमारी से जूझते हुए डॉक्टर के पास जाता है। उसे उम्मीद होती है कि पर्चे पर लिखी दवा उसके इलाज के लिए है। ऐसे में अगर उसी पर्चे के पीछे कमीशन, ब्रांड और मेडिकल स्टोर के बीच किसी कथित गठजोड़ की कहानी निकलती है तो यह महज एक मेडिकल स्टोर का विवाद नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल है।https://www.facebook.com/share/r/14jwLyHHMXk/

अब देखना यह है कि संबंधित अधिकारी इस मामले की जांच कराते हैं या फिर ‘कमीशन की जय-जयकार’ के बीच मरीज एक बार फिर सबसे कमजोर कड़ी बनकर रह जाता है।

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