नजीबाबाद रोडवेज डिपो में पेड़ कटान घोटाला: शिकायतों के बावजूद कार्रवाई शून्य

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  •  अधिकारियों तक शिकायत, फिर भी सन्नाटा
  • वन विभाग की जांच में अवैध पेड़ कटान की पुष्टि
  • रेंज केस दर्ज, जुर्माना भी जमा — लेकिन परिवहन निगम खामोश
  • वीडियो सबूत सोशल मीडिया पर वायरल, फिर भी FIR नहीं
  • डिपो प्रभारी और लेखा अधिकारी पर गंभीर आरोप

तबरेज आलम – वरिष्ठ संपादक

बिजनौर/लखनऊ।
उत्तर प्रदेश परिवहन निगम के नजीबाबाद रोडवेज डिपो (मुरादाबाद क्षेत्र) में सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने का गंभीर मामला सामने आया है। डिपो परिसर में खड़े सात हरे-भरे पेड़ों को बिना किसी वैधानिक अनुमति के कटवाकर बेच दिए जाने का आरोप है, जिससे निगम को लाखों रुपये के राजस्व नुकसान की आशंका जताई जा रही है।

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डिपो परिसर में गूलर, बकैन, शीशम, नीम, सागौन और कंजी कदम सहित कुल सात पेड़ मौजूद थे। आरोप है कि इन पेड़ों को वन विभाग और परिवहन निगम की अनुमति के बिना कटवाया गया। मामले की शिकायत के बाद 25 जुलाई 2025 को वन विभाग द्वारा परिवहन निगम के अधिकारियों की मौजूदगी में संयुक्त निरीक्षण किया गया, जिसमें पेड़ों को काटे जाने की पुष्टि हुई। निरीक्षण के दौरान पेड़ों की जड़ें आज भी परिसर में मौजूद पाई गईं।

जांच के उपरांत वन विभाग ने रेंज केस संख्या 53/2025-26 के अंतर्गत डिपो केंद्र प्रभारी, लेखा प्रभारी और कार्यदायी संस्था के प्रतिनिधि के खिलाफ वृक्ष संरक्षण अधिनियम की धारा 4/10 में मामला दर्ज किया। संबंधित लोगों द्वारा अपराध स्वीकार करते हुए वन विभाग में जुर्माना भी जमा कराया गया।

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मामले को और गंभीर बनाता है यह तथ्य कि पेड़ों को चोरी से कटवाकर बेचने से जुड़ी वीडियो सामग्री सोशल मीडिया और कुछ समाचार चैनलों पर प्रसारित हो चुकी है। इसके बावजूद उत्तर प्रदेश परिवहन निगम स्तर पर अब तक धोखाधड़ी, गबन और अमानत में खयानत जैसे गंभीर मामलों में न तो विभागीय कार्रवाई हुई है और न ही किसी आपराधिक मुकदमे की प्रक्रिया शुरू की गई है।

उच्च अधिकारियों तक शिकायत, फिर भी सन्नाटा

इस प्रकरण को लेकर क्षेत्रीय प्रबंधक, मुरादाबाद, पुलिस अधीक्षक, बिजनौर तथा प्रबंध निदेशक, उत्तर प्रदेश परिवहन निगम, लखनऊ को लिखित शिकायत पत्र सौंपे जा चुके हैं। इसके बावजूद अब तक न तो किसी प्रकार की विभागीय जांच शुरू हुई है और न ही थाना स्तर पर कोई ठोस कानूनी कार्रवाई सामने आई है।

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सेवा नियमावली और कानून क्या कहते हैं?

उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक आचरण नियमावली के तहत

सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाना या निजी लाभ के लिए उसका दुरुपयोग करना
गंभीर कदाचार की श्रेणी में आता है।
उत्तर प्रदेश वित्तीय नियमावली (Financial Handbook) के अनुसार
किसी भी सरकारी संपत्ति (भूमि, भवन, पेड़ आदि) का निस्तारण
सक्षम प्राधिकारी की लिखित अनुमति के बिना नहीं किया जा सकता।

वृक्ष संरक्षण अधिनियम स्पष्ट करता है कि
सरकारी परिसर में खड़े पेड़ों को काटने से पहले
वन विभाग की अनुमति और वैधानिक प्रक्रिया अनिवार्य है।
वहीं भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत
सरकारी संपत्ति को क्षति पहुँचाना,
धोखाधड़ी, अमानत में खयानत
दंडनीय अपराध हैं।

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अब सबसे बड़ा सवाल जब शिकायतें उच्च स्तर तक पहुँच चुकी हैं और वन विभाग की जांच में अपराध प्रमाणित हो चुका है, तो
क्या क्षेत्रीय प्रबंधन, पुलिस प्रशासन और परिवहन निगम का शीर्ष नेतृत्व इस मामले में वास्तव में कोई ठोस कार्रवाई करेगा?

या फिर यह मामला भी केवल कागज़ों तक सीमित रह जाएगा?

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