रोडवेज की कार्रवाई पर हाईकोर्ट की सख्त चोट, संविदा कर्मी की तत्काल वेतन सहित बहाली

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  • हाईकोर्ट ने कहा– प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन, आदेश निरस्त
  • सुनवाई का मौका देने का प्रमाण पेश नहीं कर सका निगम
  • हाईकोर्ट के आदेश पर बहाली और बकाया भुगतान तय

गौरव श्रीवास्तव 

लखनऊइलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम (UPSRTC) की कार्यशैली पर कड़ा रुख अपनाते हुए साफ कहा है कि बिना सुनवाई किसी कर्मचारी का कॉन्ट्रैक्ट रद्द करना कानूनन अस्वीकार्य है। कोर्ट नंबर-18 में माननीय न्यायमूर्ति श्री प्रकाश सिंह ने ऐसे आदेश को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का खुला उल्लंघन मानते हुए रद्द कर दिया।

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याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता श्री पशुपति नाथ द्विवेदी ने अदालत को बताया कि 07 नवंबर 2025 को ही कथित घटना बताकर उसी दिन याचिकाकर्ता का कॉन्ट्रैक्ट रद्द कर दिया गया, जबकि सुनवाई का कोई अवसर नहीं दिया गया। अधिवक्ता ने इसे जानबूझकर की गई कार्रवाई बताते हुए कहा कि याचिकाकर्ता को बलि का बकरा बनाया गया।

दूसरी ओर, निगम की ओर से पेश अधिवक्ता श्री अभय प्रताप सिंह (श्री रत्नेश चंद्र की ओर से) मामले की मेरिट पर विवाद तो करते रहे, लेकिन यह साबित नहीं कर सके कि याचिकाकर्ता को अपना पक्ष रखने का मौका दिया गया था।

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हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि इसी प्रकार का मुद्दा पहले ही 06 दिसंबर 2021 को सर्विस सिंगल संख्या 28465/2021 में तय हो चुका है, जिसे निगम ने कभी चुनौती नहीं दी। ऐसे में वह निर्णय अंतिम माना जाएगा।

कोर्ट ने सर्टिओरारी रिट जारी करते हुए विवादित आदेश को निरस्त कर दिया और निगम को निर्देश दिया कि यदि कोई नया आदेश पारित किया जाए तो पहले पूरी सुनवाई दी जाए और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का सख्ती से पालन किया जाए। साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता के कंडक्टर लाइसेंस के विस्तार के तथ्य पर भी विचार किया जाए।

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अदालत ने याचिकाकर्ता को तत्काल सेवा में बहाल करने और 11 अगस्त 2021 से बकाया वेतन/मानदेय छह सप्ताह के भीतर भुगतान करने का आदेश दिया। याचिका को प्रवेश स्तर पर ही स्वीकार कर लिया गया।

मार्ग से वापस आने के उपरांत लक्षित आए से कम आय प्राप्त होने पर परिचालक के ऊपर अनावश्यक दबाव एवं प्रताड़ित किए जाने पर उपरोक्त परिचालक के द्वारा पुरजोर तरीके से जब विरोध किया गया तो विभाग ने उसकी संविदा समाप्त कर दी ।
अनुशासनहीनता का आरोप लगाकर परिचालक की संविदा समाप्त कर दी गई थी।
उपरोक्त पीड़ित परिचालक न्याय की आस लिए मेरे पास आया। जिस पर हाईकोर्ट के माध्यम से पीड़ित प्रचार को न्याय दिलाया जा सका।

संतोष कुमार मिश्र

महामंत्री,रोडवेज कर्मचारी एकता संघ

3 Comments

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