- 1. 3 माह तक फैसले की कॉपी के लिए भटकता रहा बुजुर्ग, जनसुनवाई में खुली सिस्टम की पोल
- 2. पत्रावली देने में टालमटोल भारी पड़ी, डीएम ने मौके पर सुनाया निलंबन का आदेश
- 3. संपूर्ण समाधान दिवस बना निर्णायक मंच, लापरवाही पर चला प्रशासन का डंडा
- 4. फैसला पक्ष में आने के बाद भी नहीं मिले दस्तावेज, शिकायत पर गिरी गाज
रायबरेली। “न्याय में देरी भी अन्याय है…” — यह सिर्फ कथन नहीं, शनिवार को प्रशासनिक सख्ती की मिसाल बन गया। जनसुनवाई के दौरान जब 13 महीने से दफ्तरों के चक्कर काट रहे एक बुजुर्ग ने अपनी पीड़ा सुनाई, तो जिलाधिकारी हर्षिता माथुर का पारा चढ़ गया। मौके पर ही एसडीएम न्यायिक के पेशकार शिशुपाल यादव को निलंबित करने का आदेश दे दिया गया।
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3 माह की लड़ाई, फैसला आया… फिर भी नहीं मिला कागज!
बछरावां क्षेत्र के राजामऊ निवासी दुर्गा प्रसाद त्रिपाठी दो मुकदमों में 13 महीनों से न्याय के लिए संघर्ष कर रहे थे। 31 जनवरी 2025 को फैसला उनके पक्ष में आया, लेकिन असली जंग तब शुरू हुई।
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आरोप है कि फैसले की कॉपी और पत्रावली देने के नाम पर उन्हें लगातार टरकाया गया। हर बार नया बहाना, हर बार नया चक्कर। एक बुजुर्ग को सिस्टम ने इस कदर थका दिया कि आखिरकार उन्हें संपूर्ण समाधान दिवस में डीएम के सामने गुहार लगानी पड़ी।
जनसुनवाई में खुली पोल, डीएम का सख्त रुख
जैसे ही मामला सामने आया, डीएम ने पेशकार को तलब किया। देरी का कारण पूछा गया, लेकिन संतोषजनक जवाब नहीं मिला। टालमटोल और लापरवाही को गंभीर अनुशासनहीनता मानते हुए डीएम ने तत्काल प्रभाव से निलंबन का आदेश सुना दिया।
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साफ संदेश दिया गया —
“यदि फैसला आने के बाद भी किसी बुजुर्ग को फाइल के लिए भटकना पड़े, तो यह व्यवस्था की नाकामी है। ऐसे कर्मचारियों के लिए प्रशासन में कोई जगह नहीं।”
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प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप
इस कार्रवाई के बाद कलेक्ट्रेट और तहसील स्तर पर हड़कंप मच गया। कर्मचारियों को साफ संकेत मिल गया कि अब फाइल दबाने या जनता को परेशान करने की कीमत चुकानी पड़ेगी।⸻
बड़ा संदेश
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यह कार्रवाई सिर्फ एक निलंबन नहीं, बल्कि सिस्टम को चेतावनी है —
न्याय में देरी बर्दाश्त नहीं होगी।
जनता को अब “फाइल दबाओ” संस्कृति से राहत मिलने की उम्मीद जगी है।




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