9 साल की लड़ाई, आधी जीत या अधूरा न्याय?संविदा का दर्द शिक्षामित्रों के संघर्ष से समझिए

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  • सुप्रीम कोर्ट के 2017 फैसले के बाद बदली किस्मत, मानदेय बढ़ा लेकिन स्थायी दर्जा अब भी दूर
  •  ₹18,000 मानदेय से राहत, पर “समान काम-समान वेतन” की मांग अभी अधूरी
  • 9 साल की कानूनी जंग के बाद आंशिक राहत, स्थायीकरण पर फिर टिकी निगाहें

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में एक बार फिर शिक्षामित्रों का मुद्दा गरमा गया है। 2017 के ऐतिहासिक फैसले के बाद से हजारों शिक्षामित्र “समान काम, समान वेतन” और स्थायीकरण की मांग को लेकर संघर्ष कर रहे हैं। हाल ही में मानदेय बढ़ाकर ₹18,000 किए जाने के बावजूद सवाल जस का तस है — क्या यह राहत है या सिर्फ मरहम?

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सुप्रीम कोर्ट का फैसला बना टर्निंग पॉइंट

25 जुलाई 2017 को सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने सहायक अध्यापक पद पर शिक्षामित्रों का समायोजन रद्द कर दिया था। कोर्ट ने साफ कहा था कि नियमित शिक्षक बनने के लिए TET और वैधानिक चयन प्रक्रिया अनिवार्य है।

इस फैसले के बाद लाखों शिक्षामित्र फिर से मानदेय आधारित पद पर लौट आए। कई परिवार आर्थिक संकट में डूब गए, और आंदोलन की चिंगारी भड़क उठी।

समान काम, समान वेतन” क्यों नहीं मिला?

शिक्षामित्रों का तर्क था कि वे भी वही पढ़ाते हैं जो नियमित शिक्षक पढ़ाते हैं।

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लेकिन कोर्ट ने कहा —

  • भर्ती प्रक्रिया अलग
  • सेवा शर्तें अलग
  • पद की कानूनी स्थिति अलग

यही वजह रही कि “समान काम, समान वेतन” का सिद्धांत लागू नहीं हो सका।

सरकार की राहत: समाधान या समझौता?

राज्य सरकार ने हाल में मानदेय ₹10,000 से बढ़ाकर ₹18,000 करने का ऐलान किया। साथ ही स्वास्थ्य बीमा जैसी सुविधाओं की भी घोषणा हुई।

लेकिन सवाल यह है —

क्या यह बढ़ोतरी स्थायी समाधान है?

या फिर चुनावी मौसम में नाराजगी कम करने की कोशिश?

आगे क्या?

विशेषज्ञों का मानना है कि:

  •  सीधा स्थायीकरण फिलहाल कानूनी रूप से मुश्किल
  •  नई भर्ती में आयु छूट और वेटेज ही व्यावहारिक रास्ता
  •  सरकार चाहे तो विशेष कानून ला सकती है, लेकिन वह भी न्यायिक समीक्षा से बचेगा नहीं

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निष्कर्ष

शिक्षामित्रों की लड़ाई सिर्फ वेतन की नहीं, सम्मान और स्थायित्व की है।2017 का फैसला कानूनी रूप से अंतिम है, लेकिन सामाजिक और राजनीतिक बहस अभी खत्म नहीं हुई।अब निगाहें सरकार की अगली रणनीति और संभावित नई भर्ती पर टिकी हैं।

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