केजीएमयू में धर्मांतरण और लव जिहाद का बड़ा नेटवर्क? STF की जांच रिपोर्ट में कई डॉक्टरों और कर्मचारियों पर गंभीर आरोप

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  • जांच रिपोर्ट में मुस्लिम फैकल्टी, रेजिडेंट डॉक्टरों और कर्मचारियों के कथित नेटवर्क का खुलासा
  • महिला डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ को प्रेमजाल में फंसाने, धर्म परिवर्तन का दबाव बनाने और विरोध करने पर करियर बर्बाद करने की धमकी देने के आरोप
  • STF के एडीजी अमिताभ यश ने शासन को भेजी विस्तृत रिपोर्ट
  • डॉ. रमीज समेत सहयोगी डॉक्टरों और कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय जांच व कार्रवाई की संस्तुति

न्यूज़ डेस्क 

लखनऊ। किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) में कथित धर्मांतरण और लव जिहाद का मामला अब एक गंभीर संस्थागत विवाद का रूप लेता दिखाई दे रहा है। उत्तर प्रदेश स्पेशल टास्क फोर्स (STF) की जांच में विश्वविद्यालय के कुछ डॉक्टरों, फैकल्टी सदस्यों और कर्मचारियों की भूमिका को लेकर बेहद गंभीर आरोप सामने आए हैं। जांच रिपोर्ट में दावा किया गया है कि मेडिकल कॉलेज के कुछ विभागों में सक्रिय कथित नेटवर्क के जरिए हिंदू महिला रेजिडेंट डॉक्टरों, छात्राओं और नर्सिंग स्टाफ को प्रेमजाल में फंसाने, उन पर धर्म परिवर्तन और निकाह का दबाव बनाने तथा विरोध करने पर मानसिक रूप से प्रताड़ित करने की कोशिश की जाती थी।

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इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि STF की रिपोर्ट में केवल व्यक्तिगत आरोपों तक बात सीमित नहीं है, बल्कि विभागीय स्तर पर कथित संरक्षण, दबाव और शिकायतों को दबाने के प्रयासों का भी उल्लेख किया गया है। STF के अपर पुलिस महानिदेशक अमिताभ यश की ओर से 25 अगस्त 2026 को अपर मुख्य सचिव (गृह), उत्तर प्रदेश शासन को भेजे गए पत्र में जांच के निष्कर्षों का विस्तार से उल्लेख किया गया है।

दो मुकदमों से खुली जांच की परतें, KGMU के कई डॉक्टर जांच के घेरे में

रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर प्रदेश यूथ एसोसिएशन के अध्यक्ष शिवम श्रीवास्तव की शिकायत पर KGMU परिसर में कथित धर्मांतरण और लव जिहाद के मामलों की जांच STF को सौंपी गई थी। मामले की जांच STF लखनऊ के पुलिस उपाधीक्षक प्रमेश कुमार शुक्ला ने की।

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जांच के दौरान सामने आए तथ्यों के आधार पर दो अलग-अलग मुकदमों का उल्लेख किया गया है। पहला मुकदमा 23 दिसंबर 2025 को डॉ. देवऱती मिश्रा की तहरीर पर थाना चौक, लखनऊ में दर्ज हुआ। इसमें KGMU के पैथोलॉजी विभाग में कार्यरत रेजिडेंट डॉक्टर डॉ. रमीज मलिक के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता और उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम के तहत धाराएं लगाई गईं।

वहीं, दूसरा मुकदमा 29 दिसंबर 2025 को थाना कैसरबाग में दर्ज किया गया। इसमें डॉ. आदिल के खिलाफ भी गंभीर आरोपों में मामला दर्ज होने का उल्लेख है। दोनों प्रकरण संबंधित थानों में विवेचनाधीन बताए गए हैं।

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STF रिपोर्ट में आरोप लगाया गया है कि विश्वविद्यालय के कुछ विभागों में मुस्लिम फैकल्टी और रेजिडेंट डॉक्टरों को कथित रूप से संरक्षण दिया जाता था। महिला डॉक्टरों, छात्राओं और नर्सिंग कर्मचारियों को प्रेम संबंधों में उलझाकर धर्म परिवर्तन और निकाह के लिए प्रेरित करने के आरोप भी दर्ज किए गए हैं।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि विरोध करने वाली महिलाओं को करियर खराब करने, मानसिक रूप से विक्षिप्त घोषित कराने और नौकरी से निकलवाने तक की धमकियां दिए जाने की शिकायतें सामने आईं।

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‘शिकायत करो तो करियर खत्म’ STF रिपोर्ट में विभागीय संरक्षण और दबाव के गंभीर आरोप

जांच रिपोर्ट का सबसे गंभीर हिस्सा KGMU के अलग-अलग विभागों में कथित तौर पर काम कर रहे लोगों की भूमिका से जुड़ा है।

रिपोर्ट में पैथोलॉजी विभाग के डॉ. वाहिद अली, डॉ. अब्बास अली मेहंदी, डॉ. रमीज, एडिशनल प्रोफेसर डॉ. सुमायरा कय्यूम, एचओडी प्रोफेसर सुरेश बाबू सहित कई अन्य डॉक्टरों और कर्मचारियों का उल्लेख किया गया है। इनके संबंध में रिपोर्ट में विभिन्न आरोप और जांच के दौरान प्राप्त जानकारियां दर्ज हैं।

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डॉ. वाहिद अली और कथित गतिविधियां: रिपोर्ट में आरोप है कि पैथोलॉजी विभाग की बायोकेमिस्ट्री लैब से जुड़े डॉ. वाहिद अली के माध्यम से मुस्लिम छात्रों और महिलाओं के बीच एक विशेष समूह को सक्रिय रखा जाता था। मुस्लिम छात्रों को एकत्रित करने, नमाज की व्यवस्था और आपसी बैठकों का भी उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट में यह भी आरोप है कि विभाग में कार्यरत महिला डॉक्टरों के साथ कथित तौर पर भेदभावपूर्ण व्यवहार किया गया।

‘इस्लामिक मेडिकोज’ समूह का उल्लेख: STF रिपोर्ट में ‘इस्लामिक मेडिकोज’ नामक समूह का जिक्र है। इसमें वर्ष 2012 से 2016 बैच के कुछ मुस्लिम मेडिकल छात्रों और डॉक्टरों के नामों का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया गया है कि नए छात्रों को एक विशेष विचारधारा से जोड़ने की कोशिश की जाती थी। रिपोर्ट में कुछ फैकल्टी सदस्यों पर इस समूह को कथित समर्थन देने के आरोप भी लगाए गए हैं।

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प्रोफेसर सुरेश बाबू और डॉ. सुमायरा कय्यूम पर सवाल: रिपोर्ट में पैथोलॉजी विभाग के एचओडी प्रोफेसर सुरेश बाबू और एडिशनल प्रोफेसर डॉ. सुमायरा कय्यूम की भूमिका पर भी गंभीर टिप्पणियां की गई हैं। आरोप है कि शिकायत करने वाली महिला डॉक्टरों को पर्याप्त सहयोग नहीं मिला और कुछ मामलों में शिकायतों को दबाने की कोशिश हुई। रिपोर्ट में रेजिडेंट डॉक्टरों के साथ कथित भेदभाव और छुट्टी स्वीकृत करने में अलग-अलग रवैये का भी उल्लेख है।

नर्सिंग स्टाफ और महिला कर्मचारियों के मामले: गांधी वार्ड के संबंध में रिपोर्ट में नर्सिंग कर्मचारियों को प्रेमजाल में फंसाने, शारीरिक एवं मानसिक शोषण और धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाने के आरोप दर्ज हैं। माइक्रोबायोलॉजी विभाग में भी एक महिला कर्मचारी को कथित रूप से परेशान करने और शिकायत के बावजूद कार्रवाई नहीं होने का उल्लेख किया गया है।

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डॉ. नसीम खान और अन्य विभागों का जिक्र: रिपोर्ट में इंटीग्रल यूनिवर्सिटी से जुड़े डॉ. नसीम खान के संबंध में भी कुछ आरोप और जानकारियां दर्ज हैं। इसके अतिरिक्त डेंटल, मेडिसिन और रेडियोलॉजी विभागों से जुड़े लोगों की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं।

डॉ. रमीज की गिरफ्तारी का भी उल्लेख

STF की रिपोर्ट के अंतिम हिस्से में बताया गया है कि डॉ. रमीज को 9 जनवरी 2026 को थाना चौक पुलिस द्वारा गिरफ्तार किया जा चुका है। रिपोर्ट में विश्वविद्यालय की विशाखा समिति द्वारा भी प्रकरण में जांच किए जाने तथा डॉ. रमीज को संबंधित आरोपों के संबंध में दोषी पाए जाने का उल्लेख है।

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STF ने शासन को भेजे पत्र में डॉ. रमीज और उनके सहयोगी डॉक्टरों एवं कर्मचारियों के विरुद्ध नियमानुसार विभागीय जांच और अन्य कार्रवाई किए जाने को उचित बताया है।

अब शासन और KGMU प्रशासन की जवाबदेही

इस पूरे प्रकरण ने प्रदेश के प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान KGMU की कार्यप्रणाली और आंतरिक निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि जांच रिपोर्ट में दर्ज आरोपों की पुष्टि होती है तो यह केवल कुछ व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई का मामला नहीं रहेगा, बल्कि संस्थान के भीतर शिकायत निवारण, महिला सुरक्षा और प्रशासनिक जवाबदेही की भी बड़ी परीक्षा होगी।

फिलहाल यह स्पष्ट करना जरूरी है कि STF की रिपोर्ट में दर्ज आरोपों को अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। संबंधित व्यक्तियों को अपना पक्ष रखने और कानून के तहत निष्पक्ष जांच का अवसर मिलना चाहिए।

सवाल बड़ा है: जिस संस्थान में मरीजों की जिंदगी बचाने और भविष्य के डॉक्टर तैयार करने की जिम्मेदारी है, वहां महिला डॉक्टरों और कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर ऐसी शिकायतें सामने आना आखिर किसकी नाकामी है? अब निगाहें उत्तर प्रदेश शासन और KGMU प्रशासन पर टिकी हैं कि रिपोर्ट के आधार पर कितनी निष्पक्ष और प्रभावी कार्रवाई होती है।

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