- परिवहन निगम बना संविदा चालकों का ट्रेनिंग सेंटर
- कम वेतन, आधा किलोमीटर भुगतान, चालक संकट और खराब मेंटेनेंस से चरमराई व्यवस्था
- लंबी दूरी की सेवाओं में आधा किलोमीटर भुगतान, 20% चालकों की कमी और खराब मेंटेनेंस ने बढ़ाई संविदा चालकों की मुश्किलें
लखनऊ।उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम में संविदा चालकों की स्थिति दिन-प्रतिदिन बदतर होती जा रही है। हालात यह हैं कि निगम स्थायी रोजगार देने वाली संस्था कम और चालकों को तैयार कर निजी क्षेत्र को सौंपने वाला ट्रेनिंग सेंटर अधिक बनता जा रहा है। चयन प्रक्रिया, स्किल टेस्ट और जॉइनिंग पूरी होने के बाद भी बड़ी संख्या में चालक कुछ ही दिनों में नौकरी छोड़ने को मजबूर हैं।
संविदा चालकों के अनुसार निगम में मेहनत अत्यधिक है, लेकिन पारिश्रमिक बेहद कम। भुगतान प्रति किलोमीटर के आधार पर किया जाता है, जो औसतन ₹2 से ₹2.20 के बीच है। प्राइवेट बस और ट्रैवल्स में यही भुगतान कहीं अधिक मिलता है। इसी वजह से प्रशिक्षित चालक बेहतर आय की तलाश में निजी ऑपरेटरों के साथ जुड़ जाते हैं।
लंबी दूरी की बस सेवाओं में स्थिति और भी गंभीर है। नियमों के अनुसार दो चालकों की तैनाती होने पर भी दोनों को पूरा नहीं, बल्कि आधा-आधा किलोमीटर भुगतान दिया जाता है। इसका नतीजा यह होता है कि पर्याप्त कमाई के लिए चालकों को बिना रेस्ट डबल甚至 तीन ड्यूटी करनी पड़ती है। इससे न सिर्फ शारीरिक और मानसिक थकान बढ़ती है, बल्कि यात्रियों की सुरक्षा पर भी सीधा असर पड़ता है।
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बसों की हालत भी संविदा चालकों के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है। नियमित मेंटेनेंस और तकनीकी जांच की जिम्मेदारी कागजों में निगम की है, लेकिन व्यवहार में छोटी-मोटी मरम्मत और बस को चलने लायक बनाने का खर्च कई बार चालकों को ही उठाना पड़ता है। इससे उनका आर्थिक बोझ और असंतोष दोनों बढ़ता है।
दुर्घटना के मामलों में सहायता को लेकर भी चालकों में भारी नाराजगी है। निगम की ओर से मदद के दावे किए जाते हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि कानूनी और आर्थिक सहायता समय पर नहीं मिल पाती। कई मामलों में बस बनने या नुकसान की भरपाई के नाम पर चालकों से ही कटौती कर ली जाती है।
चालकों के लगातार पलायन का असर सीधे बस संचालन पर दिख रहा है। कई क्षेत्रों में करीब 20 प्रतिशत तक चालकों की कमी बनी हुई है। इसके चलते बड़ी संख्या में बसें सड़कों पर उतरने के बजाय कार्यशालाओं में खड़ी रहकर केवल शोभा बढ़ा रही हैं। यात्री सेवाएं प्रभावित हो रही हैं और निगम की आमदनी पर भी असर पड़ रहा है।
इन्हीं हालातों के कारण स्किल टेस्ट पास करने और जॉइनिंग के बाद भी नए चालक 10 से 15 दिनों में ही नौकरी छोड़ देते हैं। नतीजतन, निगम को क्षेत्र और डिपो स्तर पर बार-बार भर्तियां करनी पड़ती हैं, जिससे समय, संसाधन और धन तीनों की बर्बादी हो रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पारिश्रमिक में वास्तविक सुधार, लंबी दूरी की सेवाओं में पूर्ण किलोमीटर भुगतान, पर्याप्त रेस्ट, नियमित मेंटेनेंस और दुर्घटना सहायता की पारदर्शी व्यवस्था जल्द लागू नहीं की गई, तो परिवहन निगम को भविष्य में गंभीर चालक संकट का सामना करना पड़ेगा। मौजूदा हालात में स्थिति यह बन गई है कि परिवहन निगम चालक तैयार करता है और उसका लाभ निजी बस संचालक उठा रहे हैं।
संविदा कर्मचारियों को जितना वेतन निगम द्वारा दिया जाता हैं, बढ़ती महंगाई में उतने पैसे से भरण पोषण संभव नहीं है । ऐसी परिस्थितियों में सरकारी महकमें के चलते नए नए चालक नियमित व बेहतर व्यवस्थाओं की आस लेकर निगम में भर्ती होते हैं । परंतु संचालन प्रक्रिया,दुर्घटना,मेंटेनेंस और पारिश्रमिक देखकर कुछ ही दिनों में चालक भाग खड़े होते हैं । जिसके कारण निगम के प्रत्येक क्षेत्र में कई बसें चालक अभाव में ही खड़ी रह जाती हैं । अधिकारियों को कुछ पैसे के लालच के बजाय बेहतर नीतियाँ जो नियत गारंटी के साथ संविदा कर्मियों में भरोसा पैदा करें की उनका भविष्य निगम में सुरक्षित है तब ही परिवहन निगम तरक्की के राह पर और तेज़ी से बढ़ सकता हैं चालकों की सबसे बड़ी समश्या लंबी दूरी की सेवाओं में आधा किलोमीटर मिलना है,जिसके चलते चालकों को दो , तीन ड्यूटी बिना अवकाश के करनी पड़ती है। जिसके कारण नए कर्मी भाग खड़े होते हैं । और रोडवेज से ट्रेनिंग प्राप्त कर चुके ड्राइवरों को प्राइवेट बस चालक उनको अच्छे वेतन के साथ नौकरी दे देते हैं। जिसके चलते निगम साल के सभी माह चालक खोजते रह जाता हैं, परिवहन निगम मुख्यालय को इस मुद्दे पर अवश्य ध्यान देना चाहिए ।
संतोष कुमार मिश्र
महामंत्री,संविदा कर्मचारी एकता संघ




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