लखनऊ | 27 सितम्बर 2025
संविदा व आउटसोर्स कर्मचारी, जो अक्सर सरकारी या सार्वजनिक कार्यों में तैनात रहते हैं, अब अधिक संगठित हो चुके हैं — अदालतों और सड़कों पर उनकी आवाज सुनने को मजबूर कर रही है। एक समय “लचीला रोजगार” कहे जाने वाले इस मॉडल की विवेचना अब संवैधानिक और न्यायालयीन स्तर तक पहुँच गई है।
हाल की कोर्ट समीक्षा व न्यायालयीन फैसलों का महत्व
1. उत्तर प्रदेश – दैनिक वेजर्स का फैसला (Dharam Singh v State of UP, 19 अगस्त 2025)
सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि कई दशक से लगातार सेवा देने वाले दैनिक वेजर कर्मचारियों को नियमित कर्मचारी न बनाने का बहाना कि “वित्तीय तंगी है” अवैध है। इस निर्णय में कहा गया कि लंबे समय तक सेवा देने वाले कर्मियों को नियमित करना न्यायसंगत और संविधान (अनुच्छेद 14, 16, 21) के अनुरूप है। 
इस आदेश के आधार पर, संविदा मॉडल को “सही बहाना” नहीं बनने दिया गया कि वह स्थायीकरण को रोक दे।
2. “निरंतर आउटसोर्सिंग” पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा है कि आउटसोर्सिंग का उपयोग सार्वजनिक संस्थानों द्वारा नियमित और मूल (core) कार्यों को संभालने वाले कामों के लिए नहीं किया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि वह सरकार “संवैधानिक नियोक्ता” है — न कि बाजार की तरह व्यवहार करने वाला— और इसे संविदा द्वारा किए जाने वाले कामों में शोषण करने का कोई अधिकार नहीं है। 
3. CBSE–Raj Kumar Mishra मामला: दस्तावेज़ को अहमियत
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में स्पष्ट किया कि यदि कोई कर्मचारी यह दावा करता है कि वह आउटसोर्स एजेंसी के बजाय सीधे संगठन में काम करता है, तो उसका दावा सफल तभी होगा जब वह नियुक्ति पत्र, वेतन पर्ची, कर्मचारी रिकॉर्ड आदि लिखित साक्ष्यों से समर्थित हो। केवल “नियंत्रण / पर्यवेक्षण” की कसौटी अब निर्णायक नहीं मानी जाएगी। 
4. अनुभव का अंक (Marks for Experience) मामला
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी प्रतिपादित किया कि आउटसोर्स / संविदा माध्यम से किया गया कार्य, यदि वह उसी प्रकृति का हो जैसा नियमित कर्मचारियों का होता है, तो उस अनुभव को स्वीकार किया जाना चाहिए। इसका उपयोग भर्ती प्रक्रियाओं में निष्पक्षता की दिशा में किया जाना चाहिए। 
5. केरल हाईकोर्ट का “समान कार्य-समान वेतन” सिद्धांत
केरल उच्च न्यायालय ने यह फैसला दिया कि कोई भी नियोक्ता, चाहे वह सीधे श्रमिकों को रखे या ठेकेदार के माध्यम से, “न्यूनतम वेतन” देने का दायित्व रखता है। और यदि संविदा श्रमिक वही कार्य कर रहे हों जो नियमित श्रमिक कर रहे हों, तो उन्हें समान वेतन मिलेगा। 
परिवहन निगम संविदा कर्मचारियों के हाल के विरोध और मांगें
1. हाथरस (उत्तर प्रदेश) — ज्ञापन सौंपा गया
• हाथरस डिपो के संविदा चालक और परिचालक (drivers and conductors) ने कलेक्ट्रेट में अधिकारियों को ज्ञापन सौंपा। 
• उनकी शिकायत है कि कई सालों से वे लंबी दूरी की बसें चला रहे हैं (जैसे आगरा-लखनऊ, आगरा-देहरादून आदि) लेकिन संविदा होने की वजह से उन्हें नियमित दर्जा नहीं मिला है। 
2. यूपी परिवहन निगम — परिवार यात्रा पास (Family Travel Pass) का लाभ
• उत्तर प्रदेश सरकार ने यह फैसला किया कि परिवहन निगम के वे संविदा चालक-परिचालक और अन्य कर्मचारी जो सीधे निगम से अनुबंध पर हैं, उन्हें साल में पाँच बार पारिवारिक यात्रा पास (family travel pass) मिलेंगे — जिसमें दो मुफ्त पारिवारिक यात्रा पास और तीन PTO पारिवारिक टिकट शामिल हैं। 
• लेकिन ध्यान देने वाली बात है कि आउटसोर्स या एजेंसी के माध्यम से नियुक्त संविदा कर्मचारी इस लाभ से बाहर रखे गए हैं। 
3. महाकुंभ ड्यूटी बोनस
• महाकुंभ-2025 की ड्यूटी करने वाले यूपी परिवहन निगम के 24,071 चालकों-परिचालकों को सरकार ने 10,000-10,000 रुपये का प्रोत्साहन बोनस दिया। 
• यह बोनस उनकी “औपचारिक” संविदा स्थिति की मान्यता नहीं है बल्कि एक अस्थायी प्रोत्साहन व्यवहार है। 
4. अन्य राज्यों के रोडवेज/परिवहन निगम संघर्ष
• पंजाब Roadways / PRTC के संविदा कर्मचारियों ने नौकरी नियमितीकरण (regularisation) और वेतन वृद्धि की मांग को लेकर तीन-दिन की हड़ताल की। लगभग 8,000 संविदा कर्मचारी शामिल थे। 
• इन प्रदर्शनों में यह भी कहा गया कि संविदा प्रणाली को खत्म किया जाए, और नौकरी की सुरक्षा मिले। 
आंदोलन, संघर्ष और विरोध की ज्वाला
• राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) कर्मचारियों की हड़ताल
छत्तीसगढ़ में लगभग एक महीने तक NHM संविदा कर्मचारियों ने अनिश्चितकालीन हड़ताल की। बाद में मुख्यमंत्री की मध्यस्थता पर सरकार ने 25 कर्मचारियों को पुनर्स्थापित करने का आश्वासन दिया। बाकी मांगों पर एक समिति गठित की गई है। 
• राजस्थान में संविदा कर्मचारियों का बड़े पैमाने पर विरोध
राजस्थान में हजारों सरकारी कर्मचारियों ने संविदा-आधारित भर्ती प्रणाली को समाप्त करने, संविदा कर्मचारियों को नियमित करने तथा संविदा नियमावली (Contract Hiring Rules-2022) में उन्हें शामिल करने की मांग को लेकर जंगी प्रदर्शन किया। 
• विद्युत विभाग (UP) : “जेल भरो आंदोलन” की धमकी
यूपी के विद्युत विभाग के संविदा व आउटसोर्स कर्मचारियों ने लगातार विरोध प्रदर्शन जारी रखा है। यदि सरकार उनकी माँगें न माने तो उन्होंने “जेल भरो आंदोलन” (स्वयं गिरफ्तारी देने की धमकी) की चेतावनी दी है। 
• PSPCL (पंजाब) संविदा कर्मचारियों की हड़ताल
पंजाब स्टेट पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (PSPCL) में करीब 5,500 संविदा कर्मचारियों ने हड़ताल की। स्थायी कर्मचारियों ने ‘work-to-rule’ नीति अपनाई — यानी केवल निर्धारित कार्य समय में काम करेंगे, ओवरटाइम या अतिरिक्त दबाव नहीं स्वीकारेंगे। 
• हैदराबाद में स्वास्थ्य संविदा कर्मचारियों का प्रदर्शन
तेलंगाना में ANM (सहायक नर्स मिडवाइफ) और अन्य स्वास्थ्य संविदा कर्मियों ने काम के बढ़े बोझ, डेटा एंट्री की अधिक मांग और नियमितीकरण की मांग को लेकर प्रदर्शन किया। 
•गुहावटी में ASTC संविदा कर्मचारियों का पुनर्स्थापन आदेश
असम की राज्य परिवहन कंपनी ASTC के 771 संविदा कर्मचारियों को गिराए गए अनुबंध की अवधि के बाद पुनर्स्थापित करने का हाईकोर्ट आदेश हुआ। अदालत ने कहा कि उनकी सेवाएँ आवश्यक हैं जब तक कि इन पदों को नियमित रूप से भरा नहीं जाए। 
यह भी पढ़ें
लखनऊ: रजिस्ट्रियों में फर्जीवाड़ा उजागर, एलडीए के सात अफसरों समेत 23 पर मुकदमा
शोषण की पैनी हकीकत और झटकों का सामना
1. वेतन बकाया / देर से भुगतान
आज भी संविदा कर्मचारियों को कई महीनों तक वेतन नहीं मिलता या अधूरा भुगतान होता है। यह सबसे आम शिकायत है जिसे हर आंदोलन में प्रमुखता मिलती है।
2. प्रमोशन, वेतन वृद्धि और सेवा सुनिश्चितता का अभाव
संविदा या आउटसोर्स कर्मियों को प्रमोशन, ग्रेड परिवर्तन, स्थायी पदोन्नति आदि का अवसर लगभग न के बराबर मिलता है। एक संविदा होने के कारण उनका करियर आगे बढ़ना कठिन हो जाता है।
3. कानूनी अधिकार और सुरक्षा की कमी
अक्सर संविदा कर्मचारियों को कानूनी सुरक्षा (जैसे कि स्थायी कर्मचारियों को मिलने वाले कल्याणकारी प्रावधान) नहीं मिलती। यदि वे विरोध करते हैं तो उनके अनुबंध को नवीनीकृत न करने या उन्हें बाहर कर देने की धमकी मिलती है।
4. काम के भार का असममत वितरण
संविदा कर्मचारियों पर स्थायी कर्मचारियों जितना या उससे अधिक कार्यभार रखा जाता है, लेकिन उन्हें सुविधाएँ, अवकाश, बीमा आदि समान रूप से नहीं दिए जाते।
5. मानसिक व शारीरिक दबाव
अधिक काम, अधूरा संसाधन और नौकरी का भय तनाव, स्वास्थ्य समस्याओं व मानसिक दबाव का कारण बनते हैं — जैसा कि हैदराबाद में ANMs ने कहा कि उन्हें शारीरिक और मानसिक समस्या हो रही है। 
निष्कर्ष: आवाज अब न्यायालय और सड़कों दोनों पर
संविदा और आउटसोर्स कर्मचारियों की लड़ाई अब सिर्फ “भीरोसे” की नहीं है — यह न्यायालयीन आधार पर स्थापित एक याचिका बन चुकी है। अदालतें यह स्पष्ट कर रही हैं कि संविदा प्रणाली का दुरुपयोग नहीं हो सकता और नियमितीकरण, समान वेतन व न्याय की मांग अब मुकदमे का हिस्सा है। इसी बीच कर्मचारी मोर्चों पर भी सड़कों पर उतर आए हैं और सरकारों पर दबाव बना रहे हैं।
यह भी पढ़ें
मांगों का सार — क्या चाहिए संविदा कर्मचारियों को?
• नियुक्ति की नियमितीकरण (Regularization): जो संविदा कर्मचारी वर्षों से काम कर रहे हैं, उन्हें स्थायी पदों पर लिया जाए।
• समान अधिकारों की मांग: नियमित कर्मचारियों के बराबर सुविधाएँ (प्रमोशन, ग्रेड वृद्धि, वेतन वृद्धि, काम के घंटे, बीमा, छुट्टियाँ आदि)।
• भुगतान में पारदर्शिता: आउटसोर्स एजेंसियों द्वारा कटौती या देर से वेतन न दिया जाए।
• कार्य अवधि और जिम्मेदारियों का संतुलन: लंबे घंटे न हों, विश्राम की अवधि सुनिश्चित हो।
• प्रोत्साहन या शासन विशेष लाभ: जैसे बोनस, यात्रा पास, आदि, पर पूरा लाभ हो और नियमों में स्पष्ट लिखा हो।
नेशन स्टेशन न्यूज़ को व्हाट्सएप पर फ़ॉलो करें 👇🏻
Follow the Nation Follow the Nation station news channel on WhatsApp:
https://whatsapp.com/channel/0029Va7KAnQGufJ3nPTdjp03
हम सिर्फ़ सच दिखाते है। और झूठी ख़बरों की क्लास लगाते है। बिना लौंग लपेट वाली खबरें पढ़ने के लिए nationstationnews.com पर लॉगिन करें
ग्रुप से जुड़ें
https://chat.whatsapp.com/H2uABQrhDL81sKCShH1yBs




Total Users : 107914
Total views : 131099