लखनऊ, 26 सितंबर 2025। मोदी-योगी सरकार भले ही हर मंच से यह दावा करती रही हो कि “यूपी के सरकारी अस्पताल अब AIIMS जैसे बन चुके हैं”, लेकिन कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर की बीमारी ने इन दावों की हकीकत सामने ला दी है।
क्या हुआ था?
21 सितंबर को सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और यूपी सरकार में कैबिनेट मंत्री राजभर को अचानक चक्कर और बोलने में दिक्कत की शिकायत हुई। प्राथमिक जांच के लिए उन्हें राम मनोहर लोहिया (आरएमएल) अस्पताल, लखनऊ ले जाया गया।
हालांकि कुछ ही घंटों में डॉक्टरों की सलाह पर उन्हें शिफ्ट कर दिया गया – मेदांता हॉस्पिटल, जो प्रदेश के सबसे महंगे निजी अस्पतालों में गिना जाता है।
VIP ट्रीटमेंट, लेकिन कहाँ पर?
राजभर इस समय मेदांता में न्यूरोलॉजिस्ट की निगरानी में भर्ती हैं। मेदांता प्रबंधन ने पुष्टि की है कि उनकी हालत स्थिर है और इलाज जारी है।
24 सितंबर को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी अस्पताल पहुँचकर कुशलक्षेम पूछी।
सवाल खड़े होते हैं
अगर सरकारी अस्पताल वास्तव में विश्वस्तरीय हो चुके हैं, तो फिर कैबिनेट मंत्री को वहाँ से निजी अस्पताल क्यों भेजा गया?
क्या सरकारी संस्थानों में न्यूरो जैसी गंभीर आपात स्थितियों का इलाज करने की क्षमता नहीं है?
आँकड़ों में सच
•सरकारी अस्पतालों की कमी: 2023 की रिपोर्ट के मुताबिक, लखनऊ के प्रमुख सरकारी अस्पतालों में 30% से अधिक पद खाली हैं।
•निजी इलाज का खर्च: मेदांता में ICU का खर्च ₹50,000 से ₹1 लाख प्रतिदिन तक। स्ट्रोक ट्रीटमेंट का बिल लाखों में पहुँच सकता है।
•स्वास्थ्य बजट: 2025-26 में यूपी सरकार ने स्वास्थ्य पर कुल GSDP का 4% से भी कम खर्च किया है, जबकि WHO की सिफारिश 5–6% की है।
•निजी पर निर्भरता: प्रदेश में लगभग 70% लोग इलाज के लिए प्राइवेट अस्पतालों पर निर्भर हैं।
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राजनीति से सेहत तक
राजभर, जिन्हें 2019 में योगी कैबिनेट से बाहर किया गया था और मार्च 2024 में दोबारा शामिल किया गया, अब स्वास्थ्य संकट में भी प्राइवेट अस्पताल पर निर्भर हैं। यह सवाल खड़ा करता है कि “सबका साथ, सबका विकास” का नारा सिर्फ चुनावी वादा है या जमीनी सच्चाई भी?
निचोड़
यह मामला सिर्फ एक मंत्री की सेहत का नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम पर सवाल उठाता है।
अगर VIP नेताओं को भी सरकारी अस्पतालों पर भरोसा नहीं है, तो आम जनता किस पर भरोसा करे?
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Author: nationstationnews
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