रायबरेली एम्स में गरीबों को इलाज के बजाय “रेफर स्लिप”
रायबरेली के एम्स को इस क्षेत्र के ग्रामीण जिलों — अमेठी, प्रतापगढ़, सुल्तानपुर और उन्नाव — के मरीजों के लिए “आशा की किरण” कहा गया था।
लेकिन अब वहां भी गरीब और सामान्य मरीजों को यह कहकर लौटा दिया जा रहा है कि “बेड उपलब्ध नहीं” या “सुविधा सीमित है।”
स्थानीय लोगों का आरोप है कि कई बार एम्स में मौजूद अधिकारी वीआईपी या सिफारिश वाले मरीजों को प्राथमिकता देते हैं, जबकि सामान्य मरीजों को किसी अन्य सरकारी अस्पताल या निजी संस्थान के लिए रेफर कर दिया जाता है।
रायबरेली निवासी रामभवन मौर्य बताते हैं
“हम अपनी पत्नी को लेकर रायबरेली एम्स पहुंचे थे। डॉक्टर ने कहा कि यहां हार्ट केस की सुविधा नहीं है, लखनऊ SGPGI चले जाइए। दो दिन का चक्कर काटने के बाद हम प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराए।”
नीति का उद्देश्य था ‘जन आरोग्य समानता’, पर हकीकत अलग
भारत सरकार की “आयुष्मान भारत योजना” और राज्य सरकार की “मुख्यमंत्री जन आरोग्य योजना” का लक्ष्य था कि गरीबों को भी सर्वोत्तम इलाज मिले।
लेकिन इन संस्थानों में योजनाओं का वास्तविक लाभ “सिफारिशी वर्ग” तक सीमित होता जा रहा है।
आयुष्मान कार्ड वाले मरीजों की फाइलें कई बार “तकनीकी कारण” बताकर रोक दी जाती हैं।
विशेषज्ञों की राय
स्वास्थ्य नीति विशेषज्ञ डॉ. अनुराग सिंह (AIIMS रायबरेली के पूर्व सलाहकार) का कहना है:
“अगर AIIMS जैसे संस्थान भी सिर्फ सीमित वर्ग तक रह गए तो सरकारी चिकित्सा व्यवस्था का पूरा उद्देश्य खत्म हो जाएगा। हर मरीज को समान अवसर देना ही जन आरोग्य का असली सिद्धांत है।”
सरकार ने मांगी रिपोर्ट, लेकिन जमीनी सुधार धीमे
मुख्यमंत्री कार्यालय ने इस मुद्दे पर गंभीर रुख अपनाते हुए स्वास्थ्य विभाग और एम्स प्रशासन से रिपोर्ट मांगी है।
सूत्रों के मुताबिक, रायबरेली एम्स और लखनऊ के अन्य संस्थानों से स्पष्टीकरण मांगा गया है कि गरीब मरीजों को बार-बार रेफर क्यों किया जा रहा है।