- साफ़्टवेयर तय करेगा किसका कटेगा किसका बचेगा
- 50% आय न होने पर प्रोत्साहन काटने का खेल जारी
- दोषी अफसर बचे, निर्दोष संविदा कर्मियों पर कटौती का कहर
- सवारियाँ न उठाने की शिकायत होती, तो कार्रवाई जायज़ थी
न्यूज़ डेस्क
लखनऊ।उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम में कानून उल्टा चलता नजर आ रहा है। 50 प्रतिशत आय न होने के नाम पर निर्दोष संविदा चालकों और परिचालकों से प्रोत्साहन राशि की कटौती जारी है, जबकि अवैध डग्गामार संचालन रोकने में विफल अधिकारी पूरी तरह सुरक्षित हैं। यह सब तब हो रहा है, जब माननीय हाईकोर्ट, लखनऊ खंडपीठ ने 23 सितंबर 2025 को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि मामले में उचित, कारणयुक्त और न्यायसंगत आदेश पारित किया जाए।
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लेकिन परिवहन निगम मुख्यालय द्वारा 07 नवंबर 2025 को जारी आदेश ने यह साफ कर दिया है कि निगम ने न केवल हाईकोर्ट की मंशा को नजरअंदाज किया, बल्कि पूरे दोष को नीचे के कर्मचारियों पर थोप दिया।
कटौती उनकी, जिनका कोई दोष नहीं
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि कटौती उन कर्मियों से की जा रही है जिनका “कम आय” से कोई प्रत्यक्ष दोष ही नहीं। आय घटने का सबसे बड़ा कारण डग्गामार वाहनों का खुलेआम संचालन है, जिसे रोकने की जिम्मेदारी जिन अधिकारियों और प्रवर्तन इकाइयों की थी, उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
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नतीजा— दोष ऊपर का, दंड नीचे को।
कमज़ोर से घाटे की भरपाई
संविदा कर्मी पहले ही
- कम वेतन
- असुरक्षित नौकरी
- कभी भी हटाए जाने के डर
से जूझ रहे हैं।
अब विभागीय घाटे की भरपाई भी इन्हीं से की जा रही है। यह न्याय नहीं, संस्थागत शोषण है।
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सवारियाँ न उठाने की शिकायत होती तो बात और थी
यदि किसी चालक/परिचालक पर जानबूझकर सवारियाँ न उठाने या ड्यूटी में लापरवाही की शिकायत होती, तो कार्रवाई जायज़ मानी जा सकती थी।
लेकिन ऐसा कोई आरोप नहीं है। फिर भी वेतन पर सीधी चोट की जा रही है।
हाईकोर्ट ने कहा— ‘कारण बताओ’, निगम बोला— ‘सॉफ्टवेयर काटेगा’
याचिका 11390/2025 में हाईकोर्ट ने Speaking Order देने को कहा था, मगर निगम ने पुराने आदेशों का हवाला देकर कह दिया कि 50% से कम आय पर प्रोत्साहन का 1/3 हिस्सा सॉफ्टवेयर से स्वतः कटेगा। सवाल है— क्या अब इंसाफ सॉफ्टवेयर करेगा?
07 फरवरी 2026 से पहले फिर अदालत की शरण
संविदा कर्मियों का कहना है कि जब न्यायिक निर्देश भी कागज़ों में दबा दिए जाएँ, तो अदालत की शरण ही आख़िरी रास्ता बचता है। अब 07 फरवरी 2026 से पहले फिर हाईकोर्ट जाने की तैयारी है—इस बार जवाबदेही तय कराने के इरादे से।
निष्कर्ष:यह लड़ाई सिर्फ प्रोत्साहन राशि की नहीं, कानून के सम्मान और श्रमिक गरिमा की है।अगर अब भी दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई, तो सवाल निगम की साख पर उठेगा।
संविदा व ऑउटसोर्स कर्मियों को जितना शोषित किया जा सकता है किया जा रहा हैं ।लेकिन कर्मचारी किसी भी अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए तैयार हैं । परिवहन निगम अगर ऐसे ही रूख बनाए रखता है तो मज़बूरन संविदा व ऑउटसोर्स के हज़ारों कर्मियों के वेतन संरक्षण हेतु कोर्ट ऑफ़ कंडक्ट के लिए अपील भेजी जाएगी
संतोष कुमार मिश्र
संविदा कर्मचारी एकता संघ




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