लेखपाल पर रकम लेने का आरोप, अधिकारियों के सामने फूट-फूटकर रोया पीड़ित परिवार
सरकारी योजना की फाइलों पर उठे गंभीर सवाल
*मोहम्मद इसरार, संवाददाता*
*फर्रुखाबाद।* सरकारी योजनाओं का लाभ पाने के लिए आम आदमी आखिर जाए तो जाए कहां? अमृतपुर तहसील में शनिवार को सामने आया एक मामला इस सवाल को और गंभीर बना गया। तहसील सभागार में एक पीड़ित परिवार अधिकारियों के सामने फूट-फूटकर रोता रहा और उसकी जुबां पर बार-बार एक ही गुहार थी—“साहब, योजना का लाभ नहीं मिला तो हमारा पैसा ही वापस करा दो।”
मामला कृषक दुर्घटना बीमा योजना की फाइल से जुड़ा है। तहसील क्षेत्र के गांव कुतूलूपुर निवासी श्रीदेवी पत्नी सुरेंद्र शर्मा के अनुसार, उनके पति की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। परिवार ने सरकारी सहायता के लिए कृषक दुर्घटना बीमा योजना के तहत आवेदन किया था।
*फाइल के नाम पर रकम लेने का आरोप*
पीड़ित परिवार का आरोप है कि फाइल के सिलसिले में संबंधित लेखपाल धीरेन ने उनसे कथित तौर पर रकम ली। पीड़ित के मुताबिक उसने 5,000 रुपये, फिर 2,000 रुपये और फाइल फीडिंग के नाम पर 500 रुपये दिए। यानी कुल 7,500 रुपये।
लेकिन जिस सरकारी मदद की उम्मीद में परिवार ने आवेदन किया था, वही फाइल बाद में बटाईदार होने के आधार पर निरस्त कर दी गई।
यहीं से पीड़ित की परेशानी और बढ़ गई। उसका कहना था कि जब सरकारी योजना का लाभ ही नहीं मिला तो कम से कम उसके द्वारा कथित तौर पर दिए गए रुपये वापस कराए जाएं।
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*“ब्याज पर पैसा लेकर दिया था साहब…”*
तहसील सभागार में अधिकारियों के सामने अपनी बात रखते-रखते पीड़ित भावुक हो गया। उसकी आंखों से आंसू निकलते रहे। उसने अधिकारियों से कहा कि उसने ब्याज पर पैसा लेकर रकम दी थी, अब फाइल भी निरस्त हो गई और पैसा भी वापस नहीं मिला।
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पीड़ित की गुहार थी कि उसे योजना का लाभ नहीं मिल सकता तो उसके कथित तौर पर दिए गए रुपये ही वापस दिला दिए जाएं।
*सरकारी दफ्तर या मजबूर की परीक्षा?*
यह पूरा घटनाक्रम सिर्फ एक परिवार की पीड़ा नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था पर बड़ा सवाल है। अगर किसी सरकारी योजना की फाइल आगे बढ़ाने या फीडिंग के नाम पर वास्तव में रकम ली गई, तो यह उस व्यवस्था पर गंभीर सवाल है जिसके भरोसे गरीब और जरूरतमंद लोग सरकारी योजनाओं का लाभ लेने पहुंचते हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकारी योजना का लाभ पाने के लिए क्या आम आदमी को अपनी जेब ढीली करनी पड़ेगी? अगर आरोप गलत हैं तो प्रशासन को तत्काल निष्पक्ष जांच कर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए और यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदार अधिकारी-कर्मचारी के खिलाफ ऐसी कार्रवाई होनी चाहिए जो दूसरे कर्मचारियों के लिए भी सबक बने।
*पीड़ित को राहत के बजाय हवालात का डर?*
मामले के दौरान पीड़ित को हवालात में बंद किए जाने के निर्देश दिए जाने की बात भी सामने आई। सवाल यह है कि अपनी कथित रकम वापस मांगने के लिए अधिकारियों के पास पहुंचे व्यक्ति की शिकायत सुनने के बजाय अगर उसे ही डराया या दबाया जाएगा तो आम नागरिक अपनी समस्या लेकर प्रशासन के पास कैसे पहुंचेगा?
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सरकार भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की बात करती है, लेकिन तहसील और ब्लॉक स्तर पर यदि ऐसे आरोप लगातार सामने आते हैं तो सवाल केवल एक कर्मचारी का नहीं, बल्कि पूरे निगरानी तंत्र का बन जाता है।
*अब जांच से खुलेगा सच*
हालांकि, लेखपाल पर रिश्वत लेने के आरोप की स्वतंत्र रूप से पुष्टि अभी नहीं हुई है। यह भी स्पष्ट होना बाकी है कि कथित रकम वास्तव में किस आधार पर ली गई थी। इसलिए पूरे मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच जरूरी है।
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प्रशासन के सामने अब दोहरी जिम्मेदारी है—पहली, पीड़ित के आरोपों की निष्पक्ष जांच; दूसरी, यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो रकम लेने वाले जिम्मेदार व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई।
सरकारी योजनाओं का मकसद जरूरतमंद तक सहायता पहुंचाना है, न कि उसे दफ्तरों के चक्कर और कथित लेन-देन के बीच रुलाना। अमृतपुर तहसील का यह मामला इसी व्यवस्था की परीक्षा है।
अब देखना यह है कि प्रशासन पीड़ित की आंखों में आए आंसुओं को सिर्फ एक घटना मानकर भूल जाता है या जांच कर उस व्यवस्था की जवाबदेही भी तय करता है, जिसने एक बेबस परिवार को अधिकारियों के सामने यह कहने पर मजबूर कर दिया—“साहब, हमारा पैसा वापस करा दो।”
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