- लोकार्पण के बाद ठप डबल-डेकर बसें, बाराबंकी में बदहाल हालत उजागर
- बाराबंकी बस स्टेशन पर खड़ी बदहाल डबल-डेकर बसें, अंदर नशे के अवशेष
तबरेज आलम | वरिष्ठ संपादक
बाराबंकी/लखनऊ: राजधानी लखनऊ में “आधुनिक परिवहन” का सपना दिखाकर जिन डबल-डेकर बसों का ढोल पीटा गया था, वही बसें आज सरकारी लापरवाही की शर्मनाक मिसाल बन चुकी हैं। वर्ष 2024 में 1090 चौराहे से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा हरी झंडी दिखाकर शुरू की गई यह करोड़ों की योजना, दो साल में ही दम तोड़ती नजर आ रही है।
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हकीकत यह है कि लखनऊ की सड़कों पर सिर्फ दो डबल-डेकर बसें किसी तरह दौड़ रही हैं, जबकि बाकी बसें बाराबंकी बस स्टेशन पर कबाड़ की तरह खड़ी सड़ रही हैं। धूल, जंग और टूटे शीशे चीख-चीखकर बता रहे हैं कि सरकारी संपत्ति को भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है।
सबसे चौंकाने वाली तस्वीरें बसों के भीतर से सामने आई हैं।
अंदर शराब के अवशेष, सिगरेट के निशान, नमकीन के पैकेट, मूंगफली और खाली बोतलें—ये सब किसी गैराज की नहीं, बल्कि सरकारी बसों की हालत बयां कर रहे हैं। यह साफ इशारा है कि इन बसों का इस्तेमाल असामाजिक तत्वों के अड्डे के रूप में हो रहा है।
आरोप गंभीर हैं—कहा जा रहा है कि यह सब कर्मचारियों और वरिष्ठ फोरमैन की मौजूदगी में हो रहा है। अगर ऐसा है, तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि खुली मिलीभगत है।
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अब सवाल तीखे हैं और सीधे सत्ता-तंत्र पर जाते हैं—
- करोड़ों रुपये की बसें किसके आदेश पर यूं सड़ने के लिए छोड़ी गईं?
- रखरखाव और सुरक्षा की जिम्मेदारी किस अधिकारी की है?
- जिन बसों से जनता को सुविधा मिलनी थी, वे नशाखोरी का अड्डा कैसे बन गईं?
- और सबसे अहम—क्या सरकारी पैसे की कोई कीमत नहीं?
डबल-डेकर बसें आज विकास की नहीं, बल्कि प्रशासनिक नाकामी और जवाबदेही के अभाव की चलती-फिरती कब्रगाह बन चुकी हैं। अगर जल्द ही जिम्मेदारों पर कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मामला सिर्फ बसों की बदहाली तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे सिस्टम की पोल खोल देगा।
अब देखना यह है कि सरकार जागती है या फिर ये बसें यूं ही इतिहास की फाइलों में दफन कर दी जाएंगी।



