प्रोत्साहन कटौती पर भागता रहा परिवहन निगम, वकीलों की टालमटोल से तीसरी बार टली सुनवाई

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  • कम तनख़्वाह, ऊपर से कटौती! परिवहन निगम संविदा कर्मचारियों से कर रहा खुला अन्याय
  • 45 हजार संविदा कर्मियों की जेब पर डाका, मोटी तनख़्वाह वालों पर कोई असर नहीं
  • 3 फ़रवरी से चल रहे मामले में परिवहन निगम एक बार फिर कटघरे में खड़ा नजर आया।

न्यूज़ डेस्क 

लखनऊ:-संविदा कर्मचारियों के प्रोत्साहन भुगतान में की जा रही कटौती पर जवाब देने के बजाय निगम के वकील अदालत में टालमटोल करते रहे, जिसके चलते अब तक तीसरी बार अगली तारीख़ तय करनी पड़ी।

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अल्प वेतन पर काम कर रहे संविदा कर्मचारियों से निगम “कम आय” का बहाना बनाकर प्रोत्साहन काट रहा है, जबकि हकीकत यह है कि निगम की आय का पहिया यही कर्मचारी दिन-रात सड़क पर चलाते हैं। जिन अधिकारियों और नियमित कर्मचारियों की मोटी तनख़्वाह है, उन पर न कोई कटौती, न कोई ज़िम्मेदारी।

संविदा कर्मचारियों की इस लड़ाई को संविदा कर्मचारी एकता संघ के महामंत्री संतोष मिश्रा मजबूती से लड़ रहे हैं। उनका साफ आरोप है कि यह नीति नहीं, बल्कि संगठित शोषण है। प्रदेश भर के करीब 45 हजार संविदा व आउटसोर्स कर्मी इस अन्याय की मार झेल रहे हैं।

संतोष मिश्रा का कहना है कि

“जो कर्मचारी निगम की रीढ़ हैं, उन्हीं को कमजोर किया जा रहा है। सवाल यह है कि घाटे की जिम्मेदारी सिर्फ संविदा कर्मियों पर ही क्यों?”

बार-बार तारीख़ बढ़ने से कर्मचारियों में गुस्सा बढ़ता जा रहा है। संघ ने साफ संकेत दिए हैं कि यदि निगम ने जवाबदेही नहीं ली, तो यह लड़ाई अदालत से सड़क तक जाएगी।

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सवाल सीधा है
निगम की कमाई संविदा कर्मी करें और कटौती भी वही झेलें?

यह नीति नहीं, यह खुला तमाचा है।

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