किसानों को पराली न जलाने और खेत में ही वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन करने की दी जानकारी
सुरेश रहेजा, प्रवीण कुमार, साहिल रहेजा
बठिंडा। संवाददाता। पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, बठिंडा के कृषि विज्ञान केंद्र की ओर से ब्लॉक फूल के गांव फूल में एक दिवसीय पराली प्रबंधन जागरूकता कैंप आयोजित किया गया। कैंप में किसानों को धान की पराली जलाने के बजाय खेत में ही वैज्ञानिक एवं उपयोगी तरीकों से प्रबंधन करने के बारे में जानकारी दी गई।
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कृषि विज्ञान केंद्र बठिंडा के डिप्टी डायरेक्टर (एस.) डॉ. गुरदीप सिंह ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि पराली जलाना किसान, मिट्टी, पानी और पर्यावरण के लिए नुकसानदायक है। उन्होंने किसानों से पराली को बोझ समझने के बजाय खेत के लिए उपयोगी जैविक संसाधन के रूप में इस्तेमाल करने की अपील की।
*इन मशीनों से खेत में ही होगा पराली प्रबंधन*
उन्होंने बताया कि पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी की ओर से सुझाई गई मशीनों और तकनीकों का इस्तेमाल कर किसान पराली को खेत में ही प्रबंधित कर सकते हैं। सुपर सीडर, हैप्पी सीडर, सरफेस सीडर और स्मार्ट सीडर जैसी मशीनों के सही इस्तेमाल से पराली प्रबंधन के साथ समय पर गेहूं की बुआई भी की जा सकती है।
*मिट्टी की उर्वरता के लिए भी जरूरी*
कैंप में डॉ. गुरमीत सिंह ढिल्लों, प्रोफेसर (एक्सटेंशन एजुकेशन) ने कहा कि पराली प्रबंधन केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित विषय नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध मिट्टी की उर्वरता और टिकाऊ खेती से भी है।
डॉ. बलजीत कौर, एग्रीकल्चरल डेवलपमेंट ऑफिसर ने कृषि विभाग की ओर से पराली प्रबंधन को लेकर किए जा रहे प्रयासों की जानकारी किसानों को दी।
वहीं डॉ. सुखबीर सिंह, एग्रीकल्चरल डेवलपमेंट ऑफिसर, कृषि एवं किसान कल्याण विभाग, बठिंडा ने विभिन्न पराली प्रबंधन मशीनों की कार्यप्रणाली और उनके सही इस्तेमाल के बारे में विस्तार से बताया।
*बागवानी और सब्जियों में भी इस्तेमाल की जानकारी*
डॉ. रमनदीप कौर, हॉर्टिकल्चर डेवलपमेंट ऑफिसर, बठिंडा ने किसानों को बगीचों और सब्जियों में पराली का इस्तेमाल मल्चिंग के रूप में करने के फायदे बताए। उन्होंने कैंप में पहुंचे किसानों का धन्यवाद किया।
कैंप के दौरान किसानों को पराली जलाने से होने वाले नुकसान और खेत में अवशेष प्रबंधन की वैज्ञानिक तकनीकों के बारे में जागरूक किया गया।


