रोडवेज़ बसों को नहीं मिल रहे ड्राइवर,120 पदों में 80 रिक्त

Picture of nationstationnews

nationstationnews

  • लखनऊ में रोडवेज ड्राइवरों की भीषण कमी — 120 पदों के लिए भर्ती में आए सिर्फ 40 उम्मीदवार, सेवा प्रभावित
  • अन्य विभागों पर दबाव: अतिरिक्त कर्मियों से ओवरटाइम व किराये की बस मंगवाने पर खर्च बढ़ सकता हैं 

न्यूज़ डेस्क 

लखनऊ। राजधानी में राज्य सरकार के सार्वजनिक परिवहन तंत्र पर गंभीर संकट का संकेत दिख रहा है। उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम (UPSRTC) ने हाल ही में 120 बस ड्राइवर भर्तियाँ निकालनी थीं, लेकिन पूरे भर्ती चक्र के बाद मात्र 40 उम्मीदवार ही उपलब्‍ध हो सके। इससे न केवल डिपो के रोज़ाना शेड्यूल पर असर पड़ा है, बल्कि यात्रियों, स्कूल-कार्मिक और वाणिज्यिक संबंधी आवाजाही प्रभावित होने लगी है।

यह भी पढ़ें 

बागपत DM अस्मिता लाल का अनोखा पहल—ठंड में ठिठुरते स्ट्रीट डॉग्स के लिए बनाए गए अनोखे शेल्टर होम

किस तरह हुआ संकट उजागर

निगम ने कुछ महीनों पहले परिचालन बढ़ाने और पिक व सीजनल मांग को देखते हुए 120 स्थायी/अनुसूचित ड्राइवरों की भर्ती का विज्ञापन प्रकाशित किया। प्रारम्भिक आवेदन और परीक्षा प्रक्रियाएँ संपन्न होने के बाद चिन्हित योग्यताएँ पूरी करने वालों में बड़ी कमी सामने आई — कई उम्मीदवार शैक्षणिक या मेडिकल मानदंड पर असफल रहे, तो कुछ आवश्यक अनुभव/एचएमवी (Heavy Motor Vehicle) लाइसेंस के बिना ही आवेदन किए गए।

निगम सूत्रों का कहना है कि चयन प्रक्रिया के दौरान तकनीकी योग्यता, फिटनेस टेस्ट और बैकग्राउंड वेरिफिकेशन में भी समय लगा — पर कुल मिलाकर 120 की तुलना में मात्र 40 ही पास हुए जिससे रिक्तता 80 रह गई।

परिचालन पर पड़ा असर

  • डिपो की शिफ्टिंग और रूट अलॉटमेंट प्रभावित: सुबह-शाम के पीक समय में अधिकतर रूटों पर बसों की संख्या घटा दी गई है।
  • फेरे कम: कुछ शहर-इंटरसिटी और मेट्रो-लिंक रूटों पर रोज़ाना मिलने वाले फेरे घटाए गए हैं जिससे यात्रियों को इंतज़ार बढ़ना पड़ा।

यह भी पढ़ें 

बागपत DM अस्मिता लाल का अनोखा पहल—ठंड में ठिठुरते स्ट्रीट डॉग्स के लिए बनाए गए अनोखे शेल्टर होम

यात्री वर्ग और दिन-प्रतिदिन के आवागमन पर यह असर साफ दिख रहा है — खासकर कार्यालय जाने वाले कर्मचारी, छात्र तथा मध्यम-आय वाले परिवार जिन्हें सस्ती सार्वजनिक यात्रा की ज़रूरत रहती है।

कारण — सिर्फ़ भर्ती तक सीमित नहीं

ड्राइवरों की कमी का मुद्दा केवल भर्ती में कम संख्या तक सीमित नहीं है। यह ज़मीनी कारणों से जुड़ा बड़ा सामाजिक-आर्थिक प्रश्न बन चुका है:

  1. प्रतिस्पर्धी वेतन व शर्तें — निजी बस और लॉजिस्टिक्स कंपनियाँ बेहतर मानदेय, टर्नओवर-बोनस व सुविधाएं दे रही हैं। इसलिए युवा चालक निजी क्षेत्र की ओर अधिक आकर्षित हो रहे हैं।
  2. लंबी ड्यूटी और अनियमित शिफ्टें — रोडवेज में अक्सर लंबी दूरी और रात्री सफर की ड्यूटी लगती है, जिससे पारिवारिक व स्वास्थ्य संबंधी चिंताएँ बढ़ती हैं।
  3. प्रशिक्षण व प्रमोशन के अवसर सीमित — कुछ उम्मीदवारों ने कहा कि निजी क्षेत्र में प्रशिक्षित होने के बाद करियर ग्रोथ तेज़ दिखती है।
  4. स्थानीय आवेदकों की कमी — कुछ रूटों पर स्थानीय स्तर पर भी योग्य हुमवी-होल्डर्स कम रहे, खासकर उन इलाक़ों में जहाँ युवाओं की प्राथमिकता अन्य व्यवसायों पर है।
  5. स्वास्थ्य व मेडिकल मानक — ड्राइविंग हेल्थ सर्टिफिकेट और चिकित्सा परीक्षणों में असफलता भी एक बड़ा कारण रहा है — विशेषकर दृष्टि, सुनने व हृदय-स्वास्थ्य मानकों पर।

यात्रियों व कामगारों की प्रतिक्रिया

यात्रियों का कहना है कि सुबह-शाम की भीड़ बढ़ गई है और बसें अक्सर देर से आती हैं। कई लोग निजी बस या ऑटो पर निर्भर हो रहे हैं जिससे उनकी यात्रा लागत बढ़ी है। वहीं कुछ मौजूदा रोडवेज कर्मचारी भी बड़े ओवरटाइम और थकावट की शिकायत कर रहे हैं क्योंकि सीमित चालक उपलब्धता के चलते उनसे अतिरिक्त ड्यूटी ली जा रही है।

अधिकारी क्या कह रहे हैं

निगम के परिचालन विभाग ने स्थिति की गंभीरता स्वीकार की है और बताया गया है कि रिक्तियों को भरने के लिए नई प्रक्रिया लाने पर विचार चल रहा है। अधिकारियों ने यह भी कहा कि वे वेतन और शर्तों पर पुनर्विचार, बेहतर ट्रेनिंग प्रोग्राम और प्रोत्साहन पैकेज की सम्भावनाओं का अध्ययन कर रहे हैं ताकि भर्ती में रुचि बढ़ सके।

निगम के संभावित कदम (सूत्रों के अनुसार):

  • पुनः विज्ञापन व भर्ती तिथियों का विस्तार।
  • सैलरी/अनुबंध शर्तों में संशोधन व बोनस की व्यवस्था।
  • प्रशिक्षण-भत्ता और मेडिकल सुविधाओं में सुधार।
  • स्थानीय स्तर पर रोजगार मेलों का आयोजन।

(ध्यान दें: ऊपर उल्लिखित कदम अभी प्रस्ताव स्तर पर हैं और कार्यवाही के लिए प्राधिकारियों की हरी झण्डी आवश्यक है।)

यह भी पढ़ें 

मामूली RTO कॉन्स्टेबल सौरभ शर्मा के ठिकानों पर छापा—52 किलो सोना, 234 किलो चांदी और 500 करोड़ की संपत्ति बरामद

आर्थिक-प्रभाव और नीति संबंधी सुझाव

विशेषज्ञों का मानना है कि सार्वजनिक परिवहन को टिकाऊ बनाए रखने के लिए मात्र भर्ती भरना पर्याप्त नहीं होगा — इसे एक समग्र नीति की आवश्यकता है:

  • प्रतिस्पर्धी पारिश्रमिक पैकेज ताकि युवा ड्राइवर सार्वजनिक सेवा को अपनाने में रुचि दिखाएँ।
  • वर्क-लाइफ बैलेंस उपाय जैसे शिफ्ट-रोटेशन, सुनिश्चित रेस्ट टाइम और पारिवारिक लाभ।
  • स्थायी प्रशिक्षण एवं प्रमाणन केंद्र — ड्राइवरों के कौशल को बढ़ाने व सुरक्षा मानकों पर खरा उतरने हेतु नियमित प्रशिक्षण।
  • स्वास्थ्य देखभाल व बीमा कवरेज — खासकर लंबी दूरी के ड्राइवरों के लिए।
  • स्थानीय स्तर पर जागरूकता अभियान — युवा वर्ग को रोडवेज में करियर के विकल्पों के प्रति प्रेरित करने हेतु स्कूल/कॉलेजों व रोजगार मेलों के माध्यम से जानकारी।

आगे क्या होने की संभावना

यदि निकट भविष्य में 80 रिक्तियों को भरा नहीं गया तो निगम को और अधिक निजी किराये पर बसें लगानी पड़ सकती हैं, जिसका प्रभाव निगम की आय-व्यय स्थिति पर पड़ेगा और दीर्घकालिक रूप से सरकारी बस संचालन महंगा साबित होगा। दूसरी ओर अगर भर्ती में सुधार होते हुए उम्मीदवार मिलते हैं और वेतन/प्रशिक्षण नीति सुधरती है तो परिचालन को जल्द पुनर्स्थापित किया जा सकता है।

बिजली बिल राहत योजना शुरू आज़ से मूलधन में 25% की सीधी छूट, ब्याज पूरी तरह माफ़

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Our Visitor

1 0 7 9 0 9
Total Users : 107909
Total views : 131093