- परिवहन निगम ने 16 अक्टूबर के विरोध-प्रदर्शन पर दिखाई सख्ती — पुराना संघर्ष, संवैधानिक अधिकारों पर सवाल
- कर्मचारियों ने कहा — हम संवाद चाहते हैं, लेकिन शासन सुनने को तैयार नहीं।
लखनऊ।
उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम (UPSRTC) ने 16 अक्टूबर 2025 को प्रस्तावित भारतीय मजदूर संघ और भारतीय परिवहन मजदूर महासंघ के “विशाल जनजागरण / विरोध-प्रदर्शन एवं निजीकरण विरोधी आंदोलन” को लेकर सख्त निर्देश जारी किए हैं।
यह भी पढ़ें
मुख्यालय से जारी पत्रांक 172 एलडब्ल्यू/25-51 एलडब्ल्यू/2024, दिनांक 13 अक्टूबर 2025, में कहा गया है कि किसी भी कर्मचारी की इस प्रदर्शन में भागीदारी सेवा नियमों का उल्लंघन मानी जाएगी और उस पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।
सवाल उठता है
क्या अब कर्मचारियों को अपनी बात रखने का भी अधिकार नहीं?
निगम कर्मचारियों का कहना है कि यह आदेश न केवल कठोर है बल्कि उनके संवैधानिक अधिकारों का भी हनन करता है।

निगम का आदेश क्या कहता है
परिवहन विभाग के शासनादेश संख्या 03/2025/502/30-2-2025-60एन/73 दिनांक 16.07.2025 के हवाले से कहा गया है —
“राज्य सरकार के समक्ष अपनी समस्याओं के समाधान हेतु हड़ताल, धरना या प्रदर्शन करना अनुचित है और इसे सेवा नियमों का उल्लंघन माना जाएगा।”
साथ ही, सभी क्षेत्रीय प्रबंधकों को निर्देश दिए गए हैं कि यदि कोई अधिकारी या कर्मचारी प्रदर्शन में शामिल पाया जाए, तो उसकी अनुपस्थिति रिपोर्ट मुख्यालय भेजी जाए।
यह भी देखें
संविदा,आउटसोर्स बनाम स्थायी नौकरी — सरकार का सस्ता श्रम या युवाओं का शोषण?
Watch till end
क्योंकि यह सिर्फ एक वीडियो नहीं —
बल्कि उन लाखों युवाओं की आवाज़ है जो हर दिन सस्ते श्रम में झोंके जा रहे हैं।
अगर आप खुद संविदा या आउटसोर्स कर्मचारी हैं —
तो अपनी कहानी कमेंट सेक्शन में ज़रूर लिखें।
संवैधानिक अधिकार भी सवालों के घेरे में
भारतीय संविधान के अनुच्छेद (Articles) कर्मचारियों को सिर्फ काम करने का नहीं, बल्कि अपनी बात रखने, संगठन बनाने और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने का अधिकार भी देते हैं।
अनुच्छेद 19(1)(a):
हर नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है। यानी अपनी बात शांति से रखना या सरकार की नीतियों पर असहमति जताना अपराध नहीं है।
अनुच्छेद 19(1)(c):
हर नागरिक को संगठन या यूनियन बनाने का अधिकार है। यह श्रमिक यूनियनों के अस्तित्व का मूल आधार है।
अनुच्छेद 21:
जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार, जिसमें सम्मानपूर्वक जीविका का अधिकार भी शामिल है।
कर्मचारी संगठनों का कहना है कि जब सरकार निजीकरण के नाम पर स्थायी नौकरियाँ खत्म कर रही है, तब कर्मचारियों को इन अधिकारों का प्रयोग करने से रोकना “लोकतांत्रिक भावना के विपरीत” है।
धरनों और आंदोलनों का इतिहास
उत्तर प्रदेश रोडवेज कर्मियों का संघर्ष दशकों पुराना है।
हर दशक में कर्मचारियों को वेतन, निजीकरण, और संविदा नियुक्तियों के विरोध में सड़कों पर उतरना पड़ा है।
1983 – “सरकारी बसें हमारी पहचान” आंदोलन
निजीकरण के शुरुआती प्रयासों के खिलाफ लखनऊ, कानपुर और प्रयागराज में हज़ारों चालकों-परिचालकों ने धरना दिया था।
परिणामस्वरूप सरकार को कई योजनाएँ वापस लेनी पड़ीं।
1998 – वेतन विसंगति पर बड़ा हड़ताल
14 दिन तक बसें ठप रहीं। शासन ने धारा 144 लगाई, अनेक कर्मचारी निलंबित हुए, मगर आखिरकार वेतन संशोधन हुआ।
2017–2019 – संविदा भर्ती के विरोध में प्रदर्शन
स्थायी पदों पर ठेके के कर्मचारियों की नियुक्ति के खिलाफ आंदोलन हुए, पर शासनादेशों की आड़ में दबा दिए गए।
2023–2024 – PPP नीति पर गुस्सा
कई डिपो को निजी हाथों में सौंपे जाने के खिलाफ कर्मचारियों ने प्रदर्शन किया। लखनऊ में प्रतीकात्मक धरना भी हुआ।
अब 2025 में फिर वही सवाल — क्या निगम अब सिर्फ नाम का सरकारी संस्थान बनकर रह जाएगा?
कर्मचारियों की प्रतिक्रिया
“हम हड़ताल नहीं, संवाद चाहते हैं। लेकिन जब सरकार निजीकरण की नीति से हमारी नौकरी की सुरक्षा ही खत्म कर रही है, तब चुप रहना भी गुनाह है।”
— वरिष्ठ संघ पदाधिकारी, UPSRTC
निगम की सख्त चेतावनी
“यदि कोई अधिकारी या कर्मचारी आंदोलन, प्रदर्शन या विरोध में शामिल पाया गया तो उसके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।”
— रामसिंह वर्मा, अपर प्रधान निदेशक, परिवहन निगम
निष्कर्ष
एक ओर शासन अनुशासन की बात कर रहा है, दूसरी ओर कर्मचारी अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की।
सवाल यही है —
जब संविधान बोलने और विरोध करने का हक देता है, तो विभाग उसे छीन क्यों रहा है?
क्या कह रहे संगठन
1-अपर प्रबंध निदेशक की भाषा शैली कर्मचारियों के प्रति बिल्कुल उदारवादी नहीं है, जिसके कारण संगठन किसी भी तरीके से समझौते के लिए तैयार नहीं हो पाएंगे। कर्मचारी अपने मुख्यालय परिसर में अपनी बात रखना चाहते हैं, तो अपर प्रबंध निदेशक को ऐसे पत्र जारी कर कर्मचारियों को रोकने की जरूरत क्यों नहीं पड़ रही है। क्या संविधान मान्यता प्राप्त संगठनों व कर्मचारियों को उनके अधिकार से भी वंचित करना चाहते हैं।
जसवंत सिंह “महामंत्री”
सेन्ट्रल रीजनल वर्कशॉप कर्मचारी संघ2-मुख्यालय के अफ़सर संगठनों व कर्मचारियों के आवाज को दबाना चाहते हैं।जब जब धरने की बात संगठनों ने की है तब तब मुख्यालय ने आवाज दबाने या शासन का हवाला दिया है जो कि हमारे अधिकारों पर बड़ा प्रश्नचिह्न है।
संतोष कुमार मिश्रा “महामंत्री”
संविदा कर्मचारी एकता संघ उप्र




Total Users : 107909
Total views : 131093