कृत्रिम बारिश —दिल्ली में क्लाउड सीडिंग का ट्रायल: क्या लाभ हुआ?

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  • दिल्ली सरकार ने लगभग ₹3.21 करोड़ के बजट से पाँच क्लाउड-सीडिंग ट्रायल्स किए 
  • उन ट्रायल्स में मुख्य रूप से IIT Kanpur को कार्यभार सौंपा गया था 
  • पहली उड़ानें 28 अक्टूबर 2025 को की गई थीं, जिसमें विमान-मार्ग से सिल्वर आयोडाइड व अन्य रसायन रिलीज़ किए गए।

नई दिल्ली – राष्ट्रीय राजधानी में वायु प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए सरकार ने क्लाउड सीडिंग (सिर्फ कृत्रिम बारिश करवाने की तकनीक) को अपनाया है। इस खबर में हम देखें‌गे कि ट्रायल में अब तक क्या हुआ, किन लाभों की उम्मीद है और किन सीमाओं का सामना करना पड़ रहा है।

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क्या हुआ?

  • दिल्ली सरकार ने इस पहल के तहत करीब ₹3.21 करोड़ का बजट मंजूर किया है।  
  • ट्रायल पांच अलग-अलग उड़ानों (sorties) के माध्यम से होगा, जिनमें विमान से बादलों में सिल्वर आयोडाइड एवं अन्य सोडियम/रॉक सॉल्ट मिश्रण छोड़ा जाएगा।  
  • यह प्रयास मुख्य रूप से उन समयों और इलाकों में किया गया है जहाँ वायु गुणवत्ता बहुत खराब हो जाती है और जहां नमी-भीड़ वाले बादल पाए जा सकते हैं।  

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अब तक क्या परिणाम मिले?

  • ट्रायल चल रहे हैं और अभी तक ऐसा पुख्ता डेटा नहीं मिला है जिससे कहा जा सके कि क्लाउड सीडिंग ने वायु प्रदूषण को निश्चित रूप से और सीधे तौर पर कम कर दिया हो।  
  • हालांकि वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) में कुछ सुधार देखा गया है—उदाहरण के लिए एक रिपोर्ट के अनुसार “बहुत खराब” श्रेणी में रहने वाला AQI अब “खराब” श्रेणी में आ गया है।  
  • वैज्ञानिकों एवं पर्यावरण विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यह उपाय स्थायी समाधान नहीं है क्योंकि यह प्रदूषण के मूल कारणों (जैसे वाहनों, उद्योगों, कृषि-पराली जलने) को नहीं रोकता।  

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विशेषज्ञों की राय

  • एक वैज्ञानिक का कहना है:
    “अगर बारिश होगी तो प्रदूषण कम होगा, (लेकिन) स्रोत नहीं गया है … इसलिए जब-जब बादल हों, उसे दोहराना होगा।”  
  • तथा एक अन्य विशेषज्ञ ने कहा:
    “क्लाउड सीडिंग वास्तव में प्रदूषण का इलाज नहीं है … मुख्य उद्देश्य लोगों को दिखाना है कि कुछ हो रहा है।”  
  • निष्कर्ष यह है कि परिस्थितियों पर बहुत निर्भर है — अगर बादल न हों या नमी कम हो तो असर नहीं दिखेगा।  

निष्कर्ष

तो संक्षिप्त में — दिल्ली में क्लाउड सीडिंग का ट्रायल हुआ है, लेकिन अब तक लाभ सीमित और अस्थायी दिखाई दे रहा है। यह एक प्रयोगात्मक कदम है, जिसमें संभावित लाभ हैं, लेकिन इसे नियमित, व्यापक और लंबे-समय तक असर दिखाने वाला समाधान मानना अभी जल्द होगा। अन्य उपायों (उद्योग/वाहन नियंत्रण, कृषि-प्रदूषण आदि) के साथ मिलकर ही इसे सफल माना जा सकता है।

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