ऊंचाहार में 2027 का सियासी संग्राम: मनोज पांडे के सामने सबसे बड़ी परीक्षा!

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रायबरेली की ऊंचाहार विधानसभा सीट पर 2027 का चुनाव अभी दूर है, लेकिन सियासी तापमान तेजी से बढ़ने लगा है। कभी समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के बेहद करीबी नेताओं में गिने जाने वाले मनोज कुमार पांडेय अब योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं। 2024 के राज्यसभा चुनाव के दौरान सपा से दूरी बनाकर भाजपा के साथ जाने के बाद उनकी राजनीति ने नया मोड़ लिया और अब उनकी सबसे बड़ी चुनौती अपने पुराने गढ़ को नए राजनीतिक समीकरण में बचाए रखने की है।

तीन बार की जीत, लेकिन इस बार समीकरण अलग

मनोज पांडेय ऊंचाहार से लगातार तीन बार विधायक चुने जा चुके हैं। सपा के टिकट पर 2012, 2017 और 2022 में जीत हासिल करने वाले मनोज पांडेय की इलाके में व्यक्तिगत पकड़ को उनके समर्थक उनकी सबसे बड़ी ताकत बताते हैं।

2022 में भाजपा ने इस सीट से अमरपाल मौर्य को मैदान में उतारा था। बाद में अमरपाल मौर्य के राज्यसभा पहुंचने और भाजपा संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका मिलने के बाद ऊंचाहार में भाजपा के संभावित चेहरे को लेकर मनोज पांडेय का नाम सबसे आगे माना जा रहा है।

लेकिन 2027 का चुनाव उनके लिए सिर्फ टिकट की लड़ाई नहीं, बल्कि राजनीतिक विश्वसनीयता की भी परीक्षा होगा।

MY समीकरण से निकले थे, अब उसी समीकरण की चुनौती

मनोज पांडेय की लगातार चुनावी सफलताओं में सपा के पारंपरिक MY यानी मुस्लिम-यादव वोट बैंक की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती रही है। अब भाजपा के साथ खड़े होने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या उनका पुराना समर्थक आधार उसी मजबूती से उनके साथ रहेगा?

यही वह बिंदु है जहां 2027 का चुनाव दिलचस्प हो जाता है

अगर मुस्लिम और यादव मतदाताओं का बड़ा हिस्सा सपा के साथ वापस लामबंद होता है और उसके साथ कांग्रेस का वोट ट्रांसफर भी प्रभावी रहता है, तो मनोज पांडेय के सामने चुनौती बढ़ सकती है। दूसरी तरफ भाजपा का कोर वोट, सरकार में मंत्री के तौर पर उनकी छवि और व्यक्तिगत समर्थक आधार उनके पक्ष में जाता है।

विकास बनाम जातीय गणित

मनोज पांडेय के समर्थकों का दावा है कि विधायक और अब मंत्री के तौर पर उन्होंने ऊंचाहार क्षेत्र में विकास कार्य कराए हैं। स्थानीय स्तर पर उनकी व्यक्तिगत पहचान और संगठनात्मक सक्रियता को उनकी ताकत माना जा रहा है।

लेकिन चुनावी राजनीति में सवाल सिर्फ विकास कार्यों का नहीं होगा

क्या व्यक्तिगत लोकप्रियता जातीय समीकरण पर भारी पड़ेगी?

क्या भाजपा का वोट बैंक मनोज पांडेय को उसी तरह स्वीकार करेगा?

और सबसे बड़ा सवाल—क्या सपा-कांग्रेस गठबंधन उनके पुराने MY समीकरण को फिर से एकजुट कर पाएगा?

राहुल गांधी के खिलाफ प्रचार भी बनेगा मुद्दा?

2024 के लोकसभा चुनाव में मनोज पांडेय ने भाजपा के पक्ष में प्रचार किया था। खास तौर पर रायबरेली में कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ भाजपा के अभियान में उनकी सक्रियता को उनके राजनीतिक बदलाव के तौर पर देखा गया।

अब 2027 में यही राजनीतिक बदलाव विपक्ष के लिए बड़ा मुद्दा बन सकता है। सपा और कांग्रेस उनके पुराने बयानों और भाजपा में जाने के फैसले को चुनावी मुद्दा बनाकर मतदाताओं के सामने रख सकती हैं।

अखिलेश के करीबी से योगी सरकार के मंत्री तक

मनोज पांडेय की राजनीतिक यात्रा अपने आप में ऊंचाहार की चुनावी कहानी को समझने की सबसे बड़ी कुंजी है।

एक समय अखिलेश यादव के करीबी माने जाने वाले मनोज पांडेय आज योगी आदित्यनाथ सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं। यानी 2027 में वह पहली बार अपने पुराने सपा संगठन और MY आधार के बजाय भाजपा के राजनीतिक प्लेटफॉर्म से ऊंचाहार का चुनावी मैदान देखेंगे

यही बदलाव उनकी सबसे बड़ी ताकत भी बन सकता है और सबसे बड़ी कमजोरी भी।

असली मुकाबला बूथ पर तय होगा

ऊंचाहार में 2027 की लड़ाई को अभी से किसी एक खांचे में रखना जल्दबाजी होगी। क्योंकि चुनाव तक उम्मीदवार, गठबंधन, स्थानीय नाराजगी, टिकट वितरण और जातीय समीकरण कई बार बदल सकते हैं।

फिलहाल तस्वीर इतनी साफ है कि मनोज पांडेय के सामने अपने पुराने गढ़ को भाजपा के नए समीकरण के साथ बचाने की चुनौती है।

एक तरफ मंत्री पद, विकास कार्य और व्यक्तिगत प्रभाव की ताकत है, तो दूसरी तरफ पुराने सपा वोट बैंक के खिसकने और सपा-कांग्रेस गठबंधन के संभावित प्रभाव की चुनौती।

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अब देखना यह है कि 2027 में ऊंचाहार की जनता मनोज पांडेय के विकास और व्यक्तिगत राजनीतिक पकड़ पर भरोसा करती है या फिर बदल चुके राजनीतिक समीकरण के साथ सत्ता का रास्ता बदल देती है।

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ऊंचाहार में असली मुकाबला सिर्फ दो उम्मीदवारों के बीच नहीं होगा—यह मनोज पांडेय की पुरानी सियासी जमीन और उनकी नई भाजपा की पहचान के बीच भी होगा।

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