रीवा में स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे सवालों ने सरकार के दावों की चमक पर फिर सवालिया निशान लगा दिया है। सोशल मीडिया पर वायरल एक पोस्ट में संजय गांधी अस्पताल की व्यवस्था को लेकर गंभीर आरोप लगाए गए हैं। पोस्ट में दावा किया गया है कि एक नवजात को जन्म देने जा रही महिला इलाज के लिए अस्पताल पहुंची, लेकिन कथित तौर पर ऑपरेशन के बाद उसकी मौत हो गई। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है, लेकिन अगर मामला सही है तो यह सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की जवाबदेही का बड़ा सवाल है।
तंज यह है कि जिस सरकारी अस्पताल को आम आदमी के लिए उम्मीद की आखिरी किरण माना जाता है, वहां अगर मरीजों को इलाज से ज्यादा व्यवस्था, डॉक्टरों की उपलब्धता और जिम्मेदारी की चिंता करनी पड़े, तो फिर सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के बड़े-बड़े दावों का मतलब क्या रह जाता है?
सोशल मीडिया पोस्ट में मध्य प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के मंत्री राजेंद्र शुक्ला का भी उल्लेख करते हुए अस्पताल की व्यवस्थाओं पर सवाल उठाए गए हैं। सवाल सीधा है—अगर सरकारी अस्पताल में सब कुछ बेहतर है, तो मरीजों और उनके परिजनों की ऐसी शिकायतें बार-बार सामने क्यों आती हैं?
पोस्ट में यह भी आरोप लगाया गया है कि अस्पताल के वरिष्ठ डॉक्टर अपनी-अपनी क्लीनिक और नर्सिंग होम की व्यस्तताओं में रहते हैं और सरकारी अस्पताल की व्यवस्था जूनियर डॉक्टरों के भरोसे चल रही है। यह आरोप कितना सही है, इसकी जांच जरूरी है। क्योंकि स्वास्थ्य व्यवस्था में किसी भी स्तर की लापरवाही का खामियाजा सीधे मरीज की जिंदगी को भुगतना पड़ सकता है।
अखिलेश यादव ने पार्टी कार्यकर्ताओं को बूथ स्तर तक सक्रिय होने का संदेश दिया है। उन्होंने PDA के मुद्दे को आगे रखते हुए आगामी विधानसभा चुनाव के लिए संगठन को मजबूत करने की बात कही।
वहीं बीजेपी की ओर से भी अखिलेश यादव के आरोपों पर पलटवार किया गया है। ऐसे में 2027 के चुनाव से काफी पहले ही उत्तर प्रदेश में योगी बनाम अखिलेश की सियासी जंग तेज होती नजर आ रही है।
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और सवाल सिर्फ सरकार से नहीं, अस्पताल प्रशासन से भी है—क्या इस मामले में कोई जांच होगी? क्या ऑपरेशन से लेकर मरीज की मौत तक की पूरी मेडिकल प्रक्रिया की जांच कराई जाएगी? क्या जिम्मेदारी तय होगी?
क्योंकि जनता को भाषण नहीं, इलाज चाहिए। विज्ञापन नहीं, जवाब चाहिए। और सबसे बढ़कर—सरकारी अस्पताल में पहुंचने वाले मरीज को यह भरोसा चाहिए कि उसकी जिंदगी व्यवस्था की लापरवाही के भरोसे नहीं छोड़ी जाएगी।
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अब देखना यह है कि सरकार इन गंभीर आरोपों को महज सोशल मीडिया की पोस्ट मानकर आगे बढ़ जाती है या फिर जांच कराकर सच जनता के सामने रखती है।





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