पीएम मोदी के विदेश दौरों पर खर्च हुए सैकड़ों करोड़, अब उज्बेकिस्तान से 5 अरब डॉलर के व्यापार का लक्ष्य

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  • पीएम मोदी के विदेश दौरों पर 800 करोड़ से ज्यादा खर्च, उज्बेकिस्तान के साथ 2030 तक 5 अरब डॉलर व्यापार का लक्ष्य
  • 11 समझौतों से मजबूत हुई भारत-उज्बेकिस्तान साझेदारी, यूरेनियम और महत्वपूर्ण खनिजों पर भी बढ़ा सहयोग
  • 2014 से विदेश नीति में सक्रियता, व्यापार-निवेश से लेकर रक्षा और ऊर्जा सहयोग तक बढ़ा भारत का दायरा

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2014 में सत्ता संभालने के बाद से भारत की विदेश नीति में प्रधानमंत्री के लगातार विदेश दौरों को महत्वपूर्ण भूमिका दी गई है। पिछले करीब 12 वर्षों में प्रधानमंत्री ने दुनिया के कई प्रमुख देशों का दौरा किया और इन यात्राओं के दौरान व्यापार, निवेश, रक्षा, ऊर्जा, तकनीक, कूटनीति और रणनीतिक साझेदारी से जुड़े कई समझौते हुए। अब 30 अगस्त 2026 को उज्बेकिस्तान दौरे के दौरान भारत और उज्बेकिस्तान ने अपने संबंधों को ‘Comprehensive Strategic Partnership’ के स्तर तक पहुंचा दिया है। दोनों देशों ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 5 अरब डॉलर सालाना तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया है। मौजूदा व्यापार 1 अरब डॉलर से अधिक बताया गया है।

2014 से विदेश नीति में सक्रियता

प्रधानमंत्री मोदी ने मई 2014 में पद संभालने के बाद जून 2014 में भूटान से अपनी पहली विदेश यात्रा शुरू की थी। इसके बाद जापान, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, रूस, फ्रांस, जर्मनी, UAE, सऊदी अरब, इजरायल, अफ्रीकी देशों और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देशों की यात्राएं की गईं। उपलब्ध संकलित रिकॉर्ड के अनुसार 2014 से अब तक मोदी की अंतरराष्ट्रीय यात्राओं की संख्या 100 से अधिक यात्रा-एंट्री के स्तर तक पहुंच चुकी है। हालांकि एक यात्रा में कई देशों को शामिल किए जाने के कारण ‘दौरे’ और ‘देशों की यात्रा’ की संख्या अलग-अलग होती है।

2020 में कोरोना महामारी के कारण प्रधानमंत्री की कोई विदेश यात्रा नहीं हुई। इसके बाद 2021 से अंतरराष्ट्रीय यात्राओं का सिलसिला दोबारा तेज हुआ।

विदेश दौरों पर कितना खर्च?

प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर सरकारी खर्च का आंकड़ा संसद में विदेश मंत्रालय की ओर से अलग-अलग समय पर साझा किया जाता रहा है। इसमें प्रधानमंत्री की यात्रा से जुड़े आधिकारिक खर्च के साथ प्रतिनिधिमंडल, अधिकारियों और अन्य संबंधित व्यवस्थाओं का खर्च शामिल हो सकता है। इसलिए किसी एक यात्रा की पूरी लागत को केवल प्रधानमंत्री के विमान या यात्रा खर्च के रूप में देखना सही नहीं होगा।

उपलब्ध संसदीय आंकड़ों के आधार पर 2014 से 2025 तक विदेश यात्राओं पर 800 करोड़ रुपये से अधिक का सरकारी खर्च दर्ज किया गया है। हालांकि अंतिम आंकड़ा संबंधित यात्राओं के सभी बिल और भुगतान अपडेट होने के बाद ही स्पष्ट होता है। इसलिए इसे ‘दर्ज/उपलब्ध सरकारी खर्च’ के रूप में देखना अधिक उचित है।

सवाल—इन यात्राओं से भारत को क्या मिला?

प्रधानमंत्री के विदेश दौरों का मूल्यांकन केवल खर्च के आधार पर करना आसान नहीं है। इन यात्राओं का एक बड़ा उद्देश्य राजनीतिक संबंधों को मजबूत करना, भारतीय कंपनियों के लिए बाजार खोलना, विदेशी निवेश आकर्षित करना, रक्षा सहयोग बढ़ाना और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना रहा है।

अमेरिका के साथ भारत के संबंधों में पिछले वर्षों में रक्षा, तकनीक, सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वाड और इंडो-पैसिफिक सहयोग जैसे क्षेत्रों में विस्तार हुआ। खाड़ी देशों के साथ भारत ने ऊर्जा, निवेश, व्यापार और रणनीतिक सहयोग को मजबूत किया। रूस के साथ रक्षा और ऊर्जा संबंध जारी रहे। वहीं जापान, ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय देशों के साथ भारत ने तकनीक, निवेश और रणनीतिक सहयोग को बढ़ाया।

विदेश दौरों का एक बड़ा परिणाम यह भी रहा कि भारत ने ‘ग्लोबल साउथ’ के मुद्दों पर अपनी भूमिका को मजबूत करने की कोशिश की। 2023 में भारत की G20 अध्यक्षता के दौरान अफ्रीकी संघ को G20 का स्थायी सदस्य बनाए जाने को भी भारत की कूटनीतिक उपलब्धियों में गिना गया।

उज्बेकिस्तान दौरा क्यों महत्वपूर्ण?

प्रधानमंत्री मोदी का मौजूदा उज्बेकिस्तान दौरा मध्य एशिया में भारत की रणनीतिक सक्रियता के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ताशकंद में प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति शावकत मिर्जियोयेव की वार्ता के बाद दोनों देशों ने अपने संबंधों को Comprehensive Strategic Partnership तक बढ़ाने की घोषणा की।

इस दौरान दोनों देशों ने कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के लिए 11 समझौतों पर हस्ताक्षर किए। इनमें खनन, पर्यटन, शिक्षा, आयुर्वेद, पर्यावरण और आर्थिक सहयोग जैसे क्षेत्र शामिल हैं। दोनों देशों ने यूरेनियम की दीर्घकालिक आपूर्ति के लिए भी ढांचा तैयार करने पर सहमति जताई है।

भारत के लिए यूरेनियम आपूर्ति का मुद्दा ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा है। इसके अलावा महत्वपूर्ण खनिजों और खनन क्षेत्र में सहयोग भारत की बढ़ती रणनीतिक जरूरतों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

5 अरब डॉलर का व्यापार लक्ष्य

भारत और उज्बेकिस्तान ने 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 5 अरब डॉलर सालाना तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। वर्तमान व्यापार 1 अरब डॉलर से अधिक बताया गया है। इसका अर्थ है कि अगले कुछ वर्षों में दोनों देशों को व्यापार में कई गुना वृद्धि करनी होगी।

इसके लिए बाजार तक पहुंच, बैंकिंग और भुगतान व्यवस्था, कनेक्टिविटी और निवेश से जुड़ी बाधाओं को दूर करने पर जोर दिया गया है। रक्षा क्षेत्र में दोनों देश सैन्य उपकरणों के सह-विकास और सह-उत्पादन की संभावनाएं भी तलाशेंगे।

मोदी को उज्बेकिस्तान का सर्वोच्च सम्मान

उज्बेकिस्तान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने सर्वोच्च राजकीय सम्मान ‘Order of Oliy Darajali Dustlik’ से सम्मानित किया। यह सम्मान दोनों देशों के बीच संबंधों को मजबूत करने में उनके योगदान के लिए दिया गया।

क्या विदेश दौरे सिर्फ खर्च हैं या निवेश?

प्रधानमंत्री के विदेश दौरों को लेकर राजनीतिक बहस अक्सर दो सवालों के इर्द-गिर्द रहती है—पहला, इन यात्राओं पर कितना पैसा खर्च हुआ और दूसरा, भारत को इसके बदले क्या हासिल हुआ।

 

सरकार का तर्क रहा है कि प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत कूटनीति ने कई देशों के साथ भारत के संबंधों को नई दिशा दी है। वहीं आलोचक सवाल उठाते हैं कि विदेश यात्राओं से हुए समझौतों को वास्तविक निवेश, रोजगार, निर्यात और व्यापार में बदलने की गति कितनी रही।

यही वजह है कि किसी विदेश दौरे की सफलता को केवल समझौता ज्ञापनों की संख्या से नहीं बल्कि उसके बाद हुए वास्तविक निवेश, व्यापार वृद्धि, तकनीकी हस्तांतरण, रक्षा उत्पादन और रोजगार के आंकड़ों से मापना अधिक उपयोगी होगा।

12 साल की विदेश नीति का बड़ा सवाल

2014 से 2026 के बीच प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति में एक बात लगातार दिखाई देती है—भारत ने अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ संबंध मजबूत करने के साथ-साथ रूस, खाड़ी देशों, अफ्रीका और मध्य एशिया के साथ भी अपने रिश्तों को बनाए रखने की कोशिश की है।

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उज्बेकिस्तान के साथ रणनीतिक साझेदारी का विस्तार इसी नीति का नया उदाहरण है। मध्य एशिया ऊर्जा, खनिज, व्यापार और भू-राजनीतिक दृष्टि से भारत के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र है। ऐसे में ताशकंद के साथ संबंधों को व्यापक रणनीतिक साझेदारी तक ले जाना भारत की क्षेत्रीय कूटनीति के लिए अहम कदम माना जा रहा है।

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अब असली परीक्षा इन समझौतों के जमीन पर उतरने की है। 5 अरब डॉलर का व्यापार लक्ष्य हासिल होता है या नहीं, यूरेनियम और महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति कितनी प्रभावी होती है, रक्षा उत्पादन में कितना सहयोग आगे बढ़ता है और भारतीय कंपनियों को उज्बेकिस्तान तथा मध्य एशिया के बाजार में कितना फायदा मिलता है—इन सवालों से इस दौरे की वास्तविक सफलता तय होगी।

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कुल मिलाकर, 2014 से प्रधानमंत्री मोदी के विदेश दौरे भारत की विदेश नीति का प्रमुख हिस्सा रहे हैं। इन यात्राओं पर सरकारी खजाने से सैकड़ों करोड़ रुपये खर्च हुए हैं, लेकिन इनके मूल्यांकन का दूसरा पहलू भी है—रणनीतिक साझेदारियां, व्यापारिक लक्ष्य, ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा सहयोग और वैश्विक मंचों पर भारत की भूमिका। अब उज्बेकिस्तान के साथ 5 अरब डॉलर के व्यापार लक्ष्य के बाद नजर इस बात पर होगी कि यह कूटनीतिक पहल कितने वास्तविक आर्थिक और रणनीतिक परिणाम देती है।

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