- जॉइनिंग लेटर थमाया, फिर वापस बुलाकर फाड़ने का आरोप; तीन कर्मियों के सामने रोजी-रोटी का संकट
- राजकीय पॉलिटेक्निक राजगढ़ में कार्रवाई पर सवाल, कंपनी प्रबंधन और प्रधानाचार्य की भूमिका पर उठे गंभीर आरोप
राजगढ़। वर्षों तक संस्थान में सेवाएं देने वाले तीन आउटसोर्स कर्मचारियों को कथित तौर पर अचानक बाहर का रास्ता दिखाए जाने का मामला अब तूल पकड़ता नजर आ रहा है। कर्मचारियों का आरोप है कि 2016 से काम करने के बावजूद आउटसोर्सिंग निगम की व्यवस्था शुरू होते ही उन्हें सेवा से हटा दिया गया, जबकि उनके स्थान पर स्थानीय स्तर पर नए लोगों को मौका दिए जाने की बात कही जा रही है।
मामले ने इसलिए भी गंभीर रूप ले लिया है क्योंकि कर्मचारियों के अनुसार उन्हें पहले जॉइनिंग लेटर दिया गया, जॉइनिंग के लिए बुलाया गया और बाद में कथित तौर पर वही जॉइनिंग लेटर वापस लेकर फाड़ दिया गया। इसके बाद उन्हें तत्काल प्रभाव से काम से बाहर कर दिया गया।
“दस साल की सेवा का यही इनाम?”—कर्मियों का सवाल
पीड़ित कर्मियों का कहना है कि उन्होंने संस्थान में लंबे समय तक पूरी जिम्मेदारी के साथ सेवाएं दीं। अचानक सेवा से बाहर होने के कारण उनके परिवारों के सामने रोटी-रोजगार का संकट खड़ा हो गया है।
कर्मियों ने आरोप लगाया कि उनके स्थान पर पॉलिटेक्निक के आसपास रहने वाले कुछ लोगों को चयनित करने की प्रक्रिया अपनाई गई। उनका दावा है कि इसमें स्थानीय स्तर पर आर्थिक लेन-देन और निजी स्वार्थ की भूमिका हो सकती है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
कंपनी और प्रधानाचार्य की भूमिका पर उठे सवाल
कर्मियों ने आउटसोर्स सेवा प्रदाता कंपनी और संस्थान के प्रधानाचार्य की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाते हुए मिलीभगत और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए हैं। उनका सवाल है कि यदि पुराने कर्मियों की सेवाएं आगे नहीं बढ़ानी थीं तो उन्हें जॉइनिंग लेटर क्यों दिया गया?
दूसरा बड़ा सवाल यह है कि यदि किसी कर्मचारी को सेवा से हटाने के लिए कोई गंभीर कारण था, तो क्या उस संबंध में निदेशालय स्तर पर जांच कराई गई? क्या संबंधित कर्मियों को अपना पक्ष रखने का अवसर मिला? और क्या सेवा समाप्ति के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया गया
क्या कहते हैं नियुक्ति के दस्तावेज और नियम?
उपलब्ध दस्तावेजों में आउटसोर्स कर्मचारी की नियुक्ति को GEM निविदा/अनुबंध की सेवा शर्तों के अधीन अस्थायी व्यवस्था बताया गया है। शपथ-पत्र में 11 माह की सेवा तथा विभाग और सेवा प्रदाता कंपनी द्वारा निर्धारित नियमों का पालन करने की शर्त दर्ज है।
दस्तावेज में यह भी लिखा है कि कर्मचारी को संबंधित विभागीय नियमों और समय-समय पर जारी निर्देशों का पालन करना होगा तथा अनुशासनहीनता अथवा दस्तावेजों में गलत जानकारी पाए जाने की स्थिति में कार्रवाई की जा सकती है।
नियमों के नाम पर सबसे बड़ा सवाल
कर्मियों की ओर से दावा किया जा रहा है कि अनुबंध के बीच में किसी आउटसोर्स कर्मी को हटाने की कार्रवाई केवल स्थानीय स्तर पर प्रधानाचार्य या सेवा प्रदाता कंपनी के स्तर से मनमाने ढंग से नहीं की जानी चाहिए, बल्कि शिकायत/समस्या का विभागीय स्तर पर परीक्षण और निर्धारित प्रक्रिया का पालन जरूरी है।
यही वह बिंदु है जिस पर अब पूरा विवाद टिका है—क्या इन तीन कर्मियों को हटाने से पहले संबंधित निदेशालय को मामला भेजा गया? क्या कोई विभागीय जांच हुई? क्या कर्मचारी दोषी पाए गए? और यदि नहीं, तो सेवा समाप्ति का आधार क्या था?
उपलब्ध PDF में नियुक्ति पत्र तथा कर्मचारी द्वारा स्वीकार की गई सेवा शर्तें दिखाई देती हैं, लेकिन संबंधित शासनादेश की पूरी प्रति इस दस्तावेज में उपलब्ध नहीं है। इसलिए शासनादेश की किसी विशेष धारा को सीधे उद्धृत करने के बजाय उसके मूल आदेश से मिलान करना जरूरी होगा।
योगी सरकार के दावों और जमीनी हकीकत के बीच सवाल!
प्रदेश सरकार की ओर से आउटसोर्स कर्मचारियों को लेकर पारदर्शिता और सुरक्षा की बात कही जाती रही है। ऐसे में राजकीय पॉलिटेक्निक जैसे सरकारी संस्थान में वर्षों से काम कर रहे कर्मचारियों को लेकर उठे ये सवाल व्यवस्था की निगरानी पर भी प्रश्नचिह्न लगाते हैं।
- अगर पुराने कर्मी योग्य थे तो उन्हें हटाने की वजह क्या थी?
- अगर अनुबंध समाप्त होना कारण था तो जॉइनिंग लेटर क्यों दिया गया?
- अगर कर्मचारी दोषी थे तो जांच रिपोर्ट कहां है?
- और अगर नए लोगों का चयन हुआ है तो चयन की पारदर्शी प्रक्रिया क्या थी?
- इन सवालों के जवाब अब प्रधानाचार्य, आउटसोर्स सेवा प्रदाता कंपनी और संबंधित निदेशालय से मांगे जा रहे हैं।
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दस वर्षों तक सेवा देने का दावा करने वाले तीन कर्मियों के सामने अब सिर्फ नौकरी जाने का सवाल नहीं, बल्कि उनके परिवारों की आजीविका का संकट भी है। मामला यदि केवल अनुबंध समाप्त होने का है तो उसकी लिखित वजह और प्रक्रिया सामने आनी चाहिए। वहीं यदि किसी कर्मचारी के खिलाफ शिकायत या अनुशासनात्मक मामला था, तो उसकी जांच और कार्रवाई का रिकॉर्ड भी सार्वजनिक होना चाहिए।
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अब असली सवाल यही है—क्या नियमों के मुताबिक कार्रवाई हुई या स्थानीय स्तर पर लिए गए फैसले ने तीन परिवारों की रोजी-रोटी छीन ली?
Nation Station News की पड़ताल में यह मामला जांच और जवाबदेही की मांग करता है। संबंधित प्रधानाचार्य और सेवा प्रदाता कंपनी का पक्ष सामने आने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।


