- 30 हेक्टेयर वन भूमि से अतिक्रमण हटाने का दावा, एक दर्जन अस्थायी झोपड़ियां ध्वस्त
- वन भूमि पर पुराने कब्जे का दावा, निगम अधिकारियों ने बताया हालिया अतिक्रमण
लाड़कुई/सीहोर, मध्य प्रदेश। सीहोर जिले के लाड़कुई वन परिक्षेत्र के कोसमी स्थित कक्ष क्रमांक 426 में वन भूमि से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के बाद विवाद गहरा गया है। वन विकास निगम के अधिकारियों के अनुसार, कार्रवाई के दौरान करीब 30 हेक्टेयर वन भूमि को अतिक्रमण से मुक्त कराया गया। इस दौरान कथित तौर पर वन भूमि पर बनाए गए एक दर्जन से अधिक अस्थायी झोपड़ों को हटाया गया और वहां बोई गई फसलों को भी नष्ट किया गया।
वन विकास निगम का कहना है कि संबंधित लोगों को अतिक्रमण हटाने के लिए कई बार नोटिस दिए गए थे। इसके बावजूद वन भूमि पर खेती जारी रहने के कारण नियमानुसार कार्रवाई की गई।
कार्रवाई के बाद धरने पर पहुंचे शिवराज सिंह चौहान
वन भूमि से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई के बाद बुधनी विधायक रमाकांत भार्गव और पूर्व मुख्यमंत्री एवं केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के मौके पर पहुंचने तथा प्रभावित परिवारों के पक्ष में धरने पर बैठने की बात सामने आई है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, शिवराज सिंह चौहान ने कार्रवाई को लेकर वन अधिकारियों और कर्मचारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए और प्रभावित परिवारों के रहने-खाने की व्यवस्था का आश्वासन दिया।
इस घटनाक्रम ने वन संरक्षण, कथित पुराने कब्जों और प्रभावित परिवारों के अधिकारों को लेकर बहस छेड़ दी है। हालांकि, धरने के दौरान दिए गए बयानों और आश्वासनों की सटीक पुष्टि संबंधित वीडियो और आधिकारिक बयान से की जानी चाहिए।
निगम का दावा—कब्जे हालिया, सेटेलाइट रिकॉर्ड के आधार पर कार्रवाई
वन विकास निगम परियोजना प्रबंधक तरुण कुमार कौरव के अनुसार, संबंधित क्षेत्र में वर्ष 2012 के बाद लगाए गए प्लांटेशन को नुकसान पहुंचाकर कुछ लोगों ने वर्ष 2021 के आसपास वन भूमि पर कब्जा किया और खेती शुरू की। निगम का दावा है कि सेटेलाइट रिकॉर्ड और उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर कार्रवाई की गई तथा संबंधित लोगों को वन अधिनियम की धारा 80 के तहत नोटिस जारी किए गए।
अधिकारियों का कहना है कि हटाए गए कब्जे 4 से 5 वर्ष पुराने हैं और वन भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराने का अभियान आगे भी जारी रहेगा। निगम ने यह भी संकेत दिया है कि कार्रवाई के संबंध में अपना पक्ष वरिष्ठ अधिकारियों और मुख्यमंत्री के समक्ष रखा जाएगा।
पुराने कब्जे और वन अधिकार पत्र पर सवाल
दूसरी ओर, प्रभावित परिवारों की ओर से कब्जे लंबे समय से होने का दावा किया जा रहा है। ऐसे में यह जांच महत्वपूर्ण है कि संबंधित भूमि पर वास्तविक कब्जा कब हुआ, भूमि का राजस्व एवं वन अभिलेखों में क्या दर्जा है और क्या किसी परिवार के पास वन अधिकार अधिनियम के तहत दावा, मान्यता या अन्य वैध दस्तावेज मौजूद हैं।
वन अधिकार पत्र के संबंध में भी प्रत्येक परिवार के मामले की अलग-अलग जांच आवश्यक है। केवल कब्जे की अवधि या जुर्माने की रसीद अपने आप वन अधिकार का अंतिम प्रमाण नहीं होती।
वन संरक्षण और प्रभावित परिवारों के अधिकार—दोनों पर जवाबदेही जरूरी
इस पूरे मामले में मुख्य सवाल यह है कि वन भूमि पर कथित अतिक्रमण कब हुआ, कार्रवाई किन दस्तावेजों के आधार पर की गई और क्या सभी प्रभावित परिवारों को लागू कानूनी प्रक्रिया के तहत पर्याप्त अवसर दिया गया। साथ ही, वन भूमि पर अवैध कटाई और खेती के आरोपों की निष्पक्ष जांच भी जरूरी है।
यदि सेटेलाइट रिकॉर्ड और विभागीय अभिलेख अतिक्रमण की पुष्टि करते हैं, तो वन संरक्षण के लिए कानून के अनुसार कार्रवाई की जानी चाहिए। वहीं, यदि किसी परिवार का वैध वन अधिकार या अन्य कानूनी दावा है, तो उसका भी नियमानुसार परीक्षण होना चाहिए।
फिलहाल मामले में वन विकास निगम के दावों, प्रभावित परिवारों के पक्ष और शिवराज सिंह चौहान के आधिकारिक बयान की स्वतंत्र पुष्टि के आधार पर ही अंतिम निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए।


