- ओडीओपी योजना ने दिया नया मंच, यूपीआईटीएस में रोजाना 60 हजार रुपये की बिक्री
- नवाब हामिद अली खां से जुड़ी विरासत, तीसरी पीढ़ी संभाल रही कारोबार
रामपुर। कभी नवाबी दस्तरखान की खास पहचान रहा रामपुर का प्रसिद्ध ‘हब्शी हलवा सोहन’ अब देश ही नहीं, विदेशों में भी अपनी मिठास बिखेर रहा है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ‘एक जिला, एक उत्पाद’ (ओडीओपी) योजना के तहत इस पारंपरिक व्यंजन को बड़े बाजार और प्रदर्शनियों में मंच मिलने से कारोबार को नई रफ्तार मिली है। कारोबारी सुहेल खां के मुताबिक ग्रेटर नोएडा में आयोजित पांच दिवसीय यूपी इंटरनेशनल ट्रेड शो (यूपीआईटीएस) में उनके स्टॉल पर रोजाना करीब 40 से 50 किलो हलवे की बिक्री हुई और प्रतिदिन लगभग 60 हजार रुपये का कारोबार दर्ज किया गया।
नवाब हामिद अली खां से जुड़ी है कहानी
हब्शी हलवे की कहानी रामपुर के नवाबी दौर से जुड़ी बताई जाती है। कारोबारी सुहेल खां के अनुसार तत्कालीन नवाब हामिद अली खां अफ्रीका से एक कारीगर को रामपुर लेकर आए थे। उस कारीगर ने जड़ी-बूटियों, मेवों, केसर और देसी घी के मिश्रण से यह खास हलवा तैयार किया। बाद में इसका नुस्खा रामपुर निवासी अब्दुल हकीम खां यानी ‘हकीम जी’ को सौंपा गया।
बताया जाता है कि वर्ष 1930 में हकीम जी ने इस हलवे को आम लोगों के लिए तैयार करना शुरू किया। उस समय हलवा और देसी घी दोनों करीब चार रुपये किलो बिकते थे। आज हकीम जी की तीसरी पीढ़ी इस पारंपरिक स्वाद को आगे बढ़ा रही है।
15 किलो हलवे में चार किलो देसी घी
हब्शी हलवे को तैयार करने की प्रक्रिया भी इसे खास बनाती है। कारोबारी के मुताबिक करीब 15 किलो हलवा तैयार करने में चार किलो शुद्ध देसी घी इस्तेमाल होता है। इसमें दूध, मेवे, केसर, हेजलनट और थोड़ी मात्रा में अंकुरित गेहूं यानी ‘समनक’ मिलाया जाता है।
हलवे को करीब तीन घंटे तक धीमी आंच पर पकाया जाता है। दावा है कि समनक घी को हलवे में बांधे रखने में मदद करता है, जिससे यह जल्दी सूखता नहीं और घी अलग नहीं होता। पारंपरिक तरीके से तैयार हलवे की सामान्य शेल्फ लाइफ करीब दो महीने बताई जाती है।
खाड़ी देशों तक पहुंचा रामपुर का स्वाद
रामपुर से खाड़ी देशों में लोगों के आने-जाने के साथ 1990 के दशक में हब्शी हलवा सऊदी अरब और दुबई तक पहुंचा। कारोबारी के मुताबिक अब वहां भी इसकी मांग है। ओडीओपी के जरिए आयोजित प्रदर्शनियों में देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले खरीदारों के अलावा विदेशों से जुड़े ग्राहकों तक भी उत्पाद की पहुंच बनी है।
रामपुर के हुनर हाट में भी दस दिनों के दौरान करीब 90 हजार रुपये के कारोबार का दावा किया गया है। कारोबारी का कहना है कि पहले बड़े मेलों में स्टॉल लगाने के लिए लाखों रुपये खर्च करने पड़ते थे, जबकि सरकारी मंच मिलने से छोटे कारोबारियों के लिए यह अवसर आसान हुआ है।
जीआई टैग और आधुनिक पैकेजिंग की तैयारी
हब्शी हलवे को अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाने के लिए अब आधुनिक पैकेजिंग और ब्रांडिंग पर भी जोर दिया जा रहा है। कारोबारी के मुताबिक उत्पाद को जीआई टैग दिलाने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। साथ ही नई दिल्ली स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पैकेजिंग और जापानी पैकेजिंग तकनीक की मदद से इसकी शेल्फ लाइफ बढ़ाने पर भी विचार किया जा रहा है।
भविष्य की योजना दिल्ली और मुंबई के बड़े मॉल व सुपर स्टॉकिस्ट नेटवर्क से जुड़ने, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर उत्पाद उपलब्ध कराने और दुबई के ग्लोबल विलेज फेयर में स्थायी आउटलेट खोलने की है।
‘ओडीओपी छोटे कारोबारियों के लिए संजीवनी’
सुहेल खां, कारोबारी, हब्शी हलवा, रामपुर ने कहा कि पहले अंतरराष्ट्रीय मेलों में स्टॉल लगाने के लिए दो से तीन लाख रुपये तक की व्यवस्था करनी पड़ती थी। ओडीओपी के माध्यम से सरकारी मंच मिलने से छोटे पारंपरिक कारोबारियों को सीधे बड़े खरीदारों तक पहुंच बनाने का अवसर मिला है। उनके मुताबिक इस पहल से रामपुर के नवाबी हलवे को देश-विदेश में नई पहचान मिल रही है और थोक ऑर्डर भी मिलने लगे हैं।


