- जीदा गांव के 25 किसानों ने पांच दिवसीय प्रशिक्षण में सीखी पराली प्रबंधन की तकनीकें
बठिंडा, 17 सितंबर। पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, लुधियाना के कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) बठिंडा की ओर से जीदा गांव के किसानों के लिए आयोजित पांच दिवसीय पराली प्रबंधन प्रशिक्षण कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। प्रशिक्षण में गांव के 25 किसानों ने हिस्सा लेकर धान की पराली को जलाने के बजाय वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधित करने और खेत में उसका उपयोग करने की तकनीकें सीखीं।
पराली जलाने से मिट्टी और पर्यावरण को नुकसान
केवीके बठिंडा के डिप्टी डायरेक्टर (एस.) डॉ. गुरदीप सिंह सिद्धू ने किसानों को पराली जलाने से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान और मिट्टी की उर्वरता पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने किसानों से पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी द्वारा सुझाई गई पराली प्रबंधन तकनीकों को अपनाने की अपील की। उन्होंने कहा कि फसल अवशेषों को जलाने के बजाय खेत के लिए उपयोगी संसाधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
खेत में पराली मिलाने से सुधरेगी मिट्टी की सेहत
प्रोफेसर (एक्सटेंशन एजुकेशन) डॉ. गुरमीत सिंह ढिल्लों ने किसानों को बताया कि खेत में पराली मिलाने से मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ता है और उसकी सेहत में सुधार होता है। उन्होंने किसानों से वैज्ञानिक जानकारी अपनाने तथा आसपास के अन्य किसानों को भी पराली प्रबंधन के प्रति जागरूक करने का आह्वान किया।
पशुपालन में भी फसल अवशेषों के उपयोग की जानकारी
असिस्टेंट प्रोफेसर (एनिमल साइंस) डॉ. गुरलाल सिंह ने पराली और फसल अवशेषों की पशुपालन में उपयोगिता पर प्रकाश डाला। उन्होंने पशुओं के चारे में इनके संभावित इस्तेमाल तथा पराली प्रबंधन को पशुपालन से जोड़ने से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारियां किसानों के साथ साझा कीं।
पराली से वैल्यू-एडेड उत्पाद बनाने की संभावनाएं
असिस्टेंट प्रोफेसर (पीएफई) डॉ. रमनदीप कौर ने पराली के उचित उपयोग, फसल अवशेषों से वैल्यू-एडेड उत्पाद तैयार करने की संभावनाओं और पराली प्रबंधन में इस्तेमाल होने वाली कृषि मशीनरी के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने किसानों को पराली जलाने से बचने और उसके उपयोगी प्रबंधन के लिए प्रेरित किया।
मिट्टी जांच के आधार पर खाद के इस्तेमाल पर जोर
असिस्टेंट प्रोफेसर (सॉइल साइंस) डॉ. तेजबीर सिंह बुट्टर ने बताया कि पराली को खेत में मिलाने से जैविक पदार्थ और पोषक तत्वों का संरक्षण होता है। उन्होंने किसानों को मिट्टी की जांच के आधार पर संतुलित मात्रा में खाद और उर्वरकों का इस्तेमाल करने की सलाह दी।
बिना पराली जलाए गेहूं की बुवाई की तकनीक सीखी
प्रशिक्षण के दौरान किसानों को पराली प्रबंधन के लिए इस्तेमाल होने वाली विभिन्न कृषि मशीनों, फसल अवशेषों के वैज्ञानिक प्रबंधन तथा पराली जलाए बिना गेहूं की बुवाई की तकनीक के बारे में भी प्रशिक्षण दिया गया। किसानों को इसके आर्थिक और पर्यावरणीय लाभों की जानकारी दी गई।
प्रशिक्षण के दौरान किसानों ने कृषि वैज्ञानिकों से संवाद कर पराली प्रबंधन से जुड़े सवाल पूछे और उनका समाधान प्राप्त किया। कार्यक्रम के अंत में किसानों को खेती से संबंधित उपयोगी जानकारी के साथ फलों के पौधे भी वितरित किए गए। प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य किसानों को पराली जलाने की बजाय उसके वैज्ञानिक, पर्यावरण हितैषी और आर्थिक रूप से उपयोगी प्रबंधन के लिए प्रेरित करना रहा।


