- दो चुनाव आयुक्तों की लिखित आपत्तियों से मचा हड़कंप, Form-6 और मतदाता सूची को लेकर उठे सवाल
- 2023 के कानून में संवैधानिक पदों को सुरक्षा, पारदर्शिता और जवाबदेही पर फिर बहस तेज
नई दिल्ली। नेशन स्टेशन न्यूज़।
भारत की चुनावी प्रक्रिया को लेकर चल रहा विवाद अब चुनाव आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों से निकलकर सड़कों तक पहुंच गया है। विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR (Special Intensive Revision), मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने, नए मतदाताओं के पंजीकरण और Form-6 में किए गए बदलावों को लेकर चुनाव आयोग के दो सदस्यों की लिखित आपत्तियों ने कई सवाल खड़े किए हैं।
द इंडियन एक्सप्रेस की 25 सितंबर की रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के स्तर पर लिए गए कुछ फैसलों और आदेशों पर आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट के अनुसार इन आपत्तियों में मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने और बहाल करने, Form-6 तथा मतदाता सूची के डिजिटल सिस्टम से जुड़े मुद्दे शामिल थे।
हालांकि, चुनाव आयोग से जुड़े अधिकारियों ने इन रिपोर्टों के बाद कहा कि SIR समेत आयोग के फैसलों को तीनों आयुक्तों की मंजूरी प्राप्त थी और निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए।
Form-6 में बदलाव पर उठी आपत्ति
विवाद का एक प्रमुख केंद्र नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाला Form-6 बना।
रिपोर्ट के अनुसार इस वर्ष Form-6 के ऑनलाइन संस्करण में SIR से संबंधित एक घोषणा जोड़ी गई थी, जिसमें आवेदक से उसके या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी के पिछले SIR की मतदाता सूची में दर्ज होने के संबंध में जानकारी मांगी गई थी।
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने मई में इस बदलाव पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि निर्धारित नियमों में संशोधन किए बिना वैधानिक फॉर्म में इस तरह का बदलाव नहीं किया जा सकता। बाद में सुखबीर सिंह संधू ने भी इसे कथित तौर पर “अनधिकृत” और “अवैध” बताते हुए हटाने की मांग की।
यह विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि Form-6 देश में नए मतदाता के रूप में पंजीकरण की प्रक्रिया का प्रमुख हिस्सा है।
मतदाता सूची के डिजिटल सिस्टम पर भी सवाल
दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों का एक अन्य विषय मतदाता सूची से जुड़े डिजिटल सिस्टम और उसके नियंत्रण से संबंधित बताया गया है।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयुक्तों ने मतदाता डेटाबेस तक पहुंच और उसके केंद्रीकरण को लेकर भी सवाल उठाए। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि कुछ मामलों में स्थानीय स्तर के Electoral Registration Officers यानी EROs के सामने ऐसी तकनीकी बाधाएं आईं, जिनसे उनके द्वारा लिए गए फैसलों को डिजिटल सिस्टम में दर्ज करने में परेशानी हुई।
हालांकि इन रिपोर्टों में सामने आए दावों और उनके प्रशासनिक प्रभाव को लेकर अंतिम कानूनी निष्कर्ष अलग से सक्षम संस्थाओं द्वारा निर्धारित किया जाना बाकी है।
SIR के दौरान करोड़ों नामों की प्रक्रिया जांच के घेरे में
SIR का उद्देश्य मतदाता सूची की गहन समीक्षा और उसे अपडेट करना है। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार बिहार से शुरू हुई प्रक्रिया के राष्ट्रीय विस्तार के दौरान 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए जाने की रिपोर्ट सामने आई है।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ड्राफ्ट सूची से किसी नाम का हटना अपने आप में अंतिम रूप से मतदान का अधिकार समाप्त होना नहीं है। संबंधित मतदाता के लिए दावे और आपत्ति की प्रक्रिया मौजूद रहती है।
फिर भी सवाल यह है कि नाम हटाने के मानदंड क्या हैं, प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है और किसी वास्तविक मतदाता का नाम गलती से हटने पर उसे दोबारा जोड़ने की व्यवस्था कितनी प्रभावी है।
2023 के कानून में चुनाव आयुक्तों को विशेष कानूनी सुरक्षा
इस विवाद के बीच Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Act, 2023 की धारा 16 भी चर्चा में है।
धारा 16 के अनुसार किसी वर्तमान या पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त अथवा चुनाव आयुक्त के खिलाफ उनके आधिकारिक कर्तव्य या उसका निर्वहन करने के दौरान किए गए किसी कार्य, बात या निर्णय को लेकर अदालत में सिविल या आपराधिक कार्यवाही स्वीकार या जारी नहीं की जा सकती।
हालांकि इस कानूनी सुरक्षा को सार्वजनिक जवाबदेही से अलग विषय के रूप में देखना जरूरी है। कानूनी सुरक्षा का अस्तित्व अपने आप में किसी निर्णय को सही या गलत साबित नहीं करता।
जंतर-मंतर पर पहुंचा विवाद
इस बीच 25 सितंबर को दिल्ली के जंतर-मंतर पर चुनाव आयोग और SIR से जुड़े मुद्दों को लेकर प्रदर्शन हुआ।
रिपोर्टों के मुताबिक AISA के दिल्ली संगठन की ओर से आयोजित प्रदर्शन में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ नारे लगाए गए और उनके इस्तीफे तथा गिरफ्तारी की मांग की गई। पुलिस ने कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया। पुलिस की ओर से बताया गया कि प्रदर्शन के लिए आवश्यक अनुमति नहीं ली गई थी।
इस घटना के बाद मतदाता सूची और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर चल रही बहस और तेज हो गई है।
आरोप और तथ्य में अंतर रखना जरूरी
पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी राजनीतिक दल या संगठन की ओर से लगाया गया आरोप अपने आप में तथ्य का अंतिम प्रमाण नहीं है।
इसी तरह चुनाव आयोग की ओर से दिया गया स्पष्टीकरण भी विवादित मुद्दों पर सार्वजनिक बहस का हिस्सा है।
इसलिए Form-6, SIR, मतदाता सूची के डिजिटल नियंत्रण और चुनाव आयोग के भीतर दर्ज आपत्तियों से जुड़े प्रत्येक दावे को दस्तावेजों और आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर जांचना जरूरी है।
अब सबसे बड़ा सवाल—पारदर्शिता का
मौजूदा विवाद ने चुनाव आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया और सार्वजनिक जवाबदेही पर बहस को तेज कर दिया है।
क्या दो चुनाव आयुक्तों द्वारा दर्ज की गई आपत्तियों पर विस्तृत स्पष्टीकरण सार्वजनिक किया जाएगा?
Form-6 में बदलाव का कानूनी आधार क्या था?
मतदाता सूची के डिजिटल सिस्टम में बदलाव किस प्रक्रिया के तहत किए गए?
SIR के दौरान हटाए गए नामों की समीक्षा और पुनर्स्थापन की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या चुनाव आयोग इन सवालों पर विस्तृत दस्तावेज और स्पष्टीकरण जनता के सामने रखेगा?
चुनाव प्रक्रिया में जनता का भरोसा केवल मतदान के दिन नहीं, बल्कि मतदाता सूची तैयार होने से लेकर अंतिम परिणाम तक की पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता से जुड़ा होता है।
ऐसे में मौजूदा विवाद का अगला महत्वपूर्ण चरण आरोपों से ज्यादा दस्तावेजों, आधिकारिक जवाब और पारदर्शी प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।
नेशन स्टेशन न्यूज़ की नजर इस पूरे घटनाक्रम पर बनी हुई है।


