धन, पद, ज्ञान और रूप का अभिमान छोड़ सरलता व विनम्रता को जीवन में उतारने का संदेश
अरविंद श्रीवास्तव
बांदा। पर्युषण पर्व के दूसरे दिन जैन चौत्यालय में बाल ब्रह्मचारी पंडित श्री नन्हें भैया जी ने श्रद्धालुओं को उत्तम मार्दव धर्म का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि मार्दव धर्म का मूल भाव मनुष्य के भीतर से मान, अभिमान और अहंकार को दूर कर विनम्रता का भाव पैदा करना है।
पंडित नन्हें भैया जी ने कहा कि मनुष्य को धन, पद, ज्ञान, रूप अथवा प्रतिष्ठा किसी भी चीज का अहंकार नहीं करना चाहिए। ये सभी सांसारिक चीजें स्थायी नहीं हैं। अहंकार व्यक्ति को दूसरों से दूर करता है, जबकि विनम्रता उसके व्यवहार में मधुरता लाती है और आत्मशुद्धि का मार्ग प्रशस्त करती है।
दूसरों को छोटा समझना छोड़ समान भाव अपनाएं
उन्होंने कहा कि दूसरों को छोटा समझना छोड़कर सभी के प्रति समान भाव रखना ही सच्चा मार्दव धर्म है। पर्युषण पर्व आत्मचिंतन और आत्मशुद्धि का अवसर है। उन्होंने कहा कि कोमलता ही महानता है। झुकता वही है, जिसमें सम्यक ज्ञान होता है।
पंडित नन्हें भैया जी ने अहंकार को पानी के बुलबुले के समान बताते हुए कहा कि नम्रता सागर की तरह गहरी होती है। मनुष्य को न तन का अभिमान करना चाहिए, न धन का और न ही रूप-सौंदर्य का। जीवन में सरलता और विनम्रता अपनाकर ही व्यक्ति अपने भीतर के अहंकार और कषायों को दूर कर सकता है।
प्रवचन के उपरांत मां जिनवाणी की स्तुति हुई। महिलाओं और पुरुषों ने भाव-विभोर होकर नृत्य करते हुए मां जिनवाणी की आरती की। इस दौरान चौत्यालय का वातावरण भक्तिमय बना रहा।


