ज्ञानेश कुमार पर FIR क्यों नहीं?

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  • 2023 में ऐसा क्या कानून बना, जिसने CEC और चुनाव आयुक्तों को आधिकारिक कार्यों पर दी विशेष कानूनी सुरक्षा?
  • Section 16 में सिविल और क्रिमिनल कार्यवाही पर रोक का प्रावधान, अब इसी धारा की सीमा और संवैधानिक वैधता पर उठ रहे सवाल

 

नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ FIR दर्ज कराने की मांग के बीच 2023 में बने उस कानून की चर्चा तेज हो गई है, जिसके Section 16 में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन से जुड़े कृत्यों पर सिविल और आपराधिक कार्यवाही से विशेष सुरक्षा दी गई है।

यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर राजनीतिक और कानूनी बहस चल रही है। 24 सितंबर 2026 को तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा ने दिल्ली के पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने में CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ शिकायत देकर FIR दर्ज करने की मांग की थी। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार पुलिस ने शिकायत प्राप्त कर ली थी, लेकिन तत्काल FIR दर्ज नहीं की गई और शिकायत सत्यापन के अधीन बताई गई।

2023 में आया था नया कानून, दिसंबर में जोड़ा गया Section 16

मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा शर्तों और कार्यकाल से संबंधित Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Act, 2023 संसद ने पारित किया था। कानून को 28 दिसंबर 2023 को अधिनियमित किया गया और India Code के अनुसार यह 2 फरवरी 2024 से प्रभावी हुआ।

इस कानून का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा मौजूदा विवाद के संदर्भ में Section 16 है।

इस धारा के अनुसार, कोई अदालत ऐसे वर्तमान या पूर्व CEC अथवा Election Commissioner के खिलाफ सिविल या आपराधिक कार्यवाही को शुरू या जारी नहीं रख सकती, यदि संबंधित कार्य, बात या कृत्य उसके official duty or function के निर्वहन या उसके निर्वहन का दावा करते हुए किए गए हों।

यही वह प्रावधान है, जिसे लेकर अब यह सवाल उठ रहा है कि किसी CEC के खिलाफ आपराधिक शिकायत की स्थिति में इस सुरक्षा की सीमा आखिर कहां तक है।

दिलचस्प बात—Section 16 मूल बिल में नहीं था

इस कानून की प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण तथ्य संसद के रिकॉर्ड से सामने आता है।

विधेयक को 10 अगस्त 2023 को राज्यसभा में पेश किया गया था। लेकिन 12 दिसंबर 2023 को विधेयक पर विचार के दौरान तत्कालीन कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने Amendment No. 39 के जरिए नया Clause 15A जोड़ने का प्रस्ताव रखा।

राज्यसभा के आधिकारिक रिकॉर्ड में इस नए Clause 15A का शीर्षक ही “Protection of Chief Election Commissioner and other Election Commissioners” दर्ज है। प्रस्ताव को सदन ने स्वीकार किया। बाद में यही प्रावधान कानून के Section 16 के रूप में सामने आया।

राज्यसभा की कार्यवाही में इस संशोधन का उद्देश्य चुनाव आयुक्तों को अपने आधिकारिक कार्यों के निर्वहन में स्वतंत्र रूप से काम करने में सक्षम बनाना बताया गया था।

क्या Section 16 का मतलब है कि FIR हो ही नहीं सकती?

यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी सवाल है।

Section 16 के शब्द सीधे तौर पर यह नहीं कहते कि “FIR दर्ज नहीं की जा सकती” या “पुलिस गिरफ्तारी नहीं कर सकती।”

धारा मुख्य रूप से यह कहती है कि किसी वर्तमान या पूर्व CEC अथवा Election Commissioner के खिलाफ अदालत ऐसे सिविल या आपराधिक proceedings को entertain या continue नहीं करेगी, यदि संबंधित कृत्य उसके आधिकारिक कर्तव्य या कार्य के निर्वहन में किया गया हो या ऐसा करने का दावा करते हुए किया गया हो।

इसलिए किसी खबर में यह कहना कि “Section 16 के कारण ज्ञानेश कुमार के खिलाफ FIR कानूनन असंभव है”, बिना न्यायिक व्याख्या के एक अंतिम कानूनी निष्कर्ष होगा।

मौजूदा स्थिति को अधिक सटीक रूप से इस तरह समझा जा सकता है कि Section 16 आधिकारिक कर्तव्य से जुड़े कृत्यों पर विशेष वैधानिक सुरक्षा देता है और इस सुरक्षा की सीमा ही मौजूदा विवाद का महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न है।

FIR की मांग किस मामले में उठी?

यह पूरा विवाद SIR और मतदाता सूची से जुड़े फैसलों को लेकर सामने आया है।

24 सितंबर को महुआ मोइत्रा ने CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ शिकायत में आरोप लगाया कि चुनावी सूची से जुड़े मामलों में अनियमितताएं हुईं और कुछ निर्णयों को लेकर अन्य चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां थीं। पुलिस शिकायत में FIR और जांच की मांग की गई थी।

इससे पहले The Indian Express की रिपोर्ट में दावा किया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने करीब दस महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के कुछ फैसलों और आदेशों पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट में इन आपत्तियों को नए मतदाताओं को जोड़ने, नाम हटाने और बहाल करने तथा SIR और मतदाता पंजीकरण से जुड़े मुद्दों से जोड़ा गया।

हालांकि, इन रिपोर्टों और राजनीतिक आरोपों को स्वयं में किसी आपराधिक कृत्य का न्यायिक प्रमाण नहीं माना जा सकता।

अब असली सवाल—Official Duty की सीमा क्या है?

Section 16 की व्याख्या में सबसे अहम प्रश्न यही है कि किसी विवादित कार्रवाई को “official duty or function” के दायरे में माना जाए या नहीं।

यदि कोई कार्य चुनाव आयोग के संवैधानिक और वैधानिक कार्यों के निर्वहन से जुड़ा है, तो Section 16 की सुरक्षा का सवाल सामने आएगा।

लेकिन यदि किसी मामले में आरोप लगाया जाए कि कथित कृत्य आधिकारिक कार्य की सीमा से बाहर था, तो यह प्रश्न उठ सकता है कि क्या Section 16 उस कार्रवाई को भी सुरक्षा देता है।

25 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक याचिका से जुड़ी रिपोर्टों में भी इसी तरह का तर्क सामने आया है कि कथित मतदाता सूची हेरफेर जैसी कार्रवाई, यदि आधिकारिक कर्तव्य से वैधानिक रूप से संबंधित नहीं मानी जाए, तो Section 16 की सुरक्षा का लाभ नहीं मिलना चाहिए। यह याचिकाकर्ता का तर्क है, अदालत का अंतिम निष्कर्ष नहीं।

Section 16 की संवैधानिक वैधता भी अदालत के सामने

Section 16 की संवैधानिक वैधता पर भी न्यायिक चुनौती दी जा चुकी है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रावधान को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार और चुनाव आयोग का पक्ष सुनने की प्रक्रिया शुरू की थी। रिपोर्टों के अनुसार अदालत ने फिलहाल प्रावधान पर रोक नहीं लगाई थी।

इसका मतलब यह है कि Section 16 अभी कानून की किताब में मौजूद है, लेकिन उसकी संवैधानिक वैधता और वास्तविक दायरे को लेकर न्यायिक सवाल मौजूद हैं।

सड़क से संसद और अब अदालत तक पहुंचा विवाद

SIR और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर राजनीतिक विरोध और प्रदर्शन भी हुए हैं। दूसरी ओर चुनाव आयोग की ओर से फैसलों को संस्थागत प्रक्रिया का हिस्सा बताया गया है और आयोग ने अपने कामकाज का बचाव किया है।

मौजूदा विवाद में इसलिए तीन अलग-अलग स्तरों को अलग रखना जरूरी है—

पहला, चुनाव आयोग के फैसलों को लेकर राजनीतिक आरोप और असहमति।

दूसरा, पुलिस के पास दर्ज शिकायत और FIR की मांग।

तीसरा, Section 16 की कानूनी सुरक्षा और उसकी संवैधानिक व्याख्या।

इन तीनों को एक ही बात मान लेना कानूनी स्थिति को सरल बनाकर पेश करना होगा।

निष्कर्ष: सवाल FIR से ज्यादा Section 16 की सीमा का

ज्ञानेश कुमार के खिलाफ FIR की मांग ने 2023 के कानून के Section 16 को एक बार फिर बहस के केंद्र में ला दिया है।

फिलहाल तथ्य यह है कि Section 16 लागू है और आधिकारिक कर्तव्य से जुड़े कृत्यों के संबंध में CEC तथा चुनाव आयुक्तों को विशेष सुरक्षा देता है। साथ ही, इस प्रावधान की संवैधानिक वैधता और इसके दायरे को लेकर अदालत में चुनौती और कानूनी बहस जारी है।

इसलिए फिलहाल सबसे बड़ा कानूनी सवाल यही है—

क्या किसी CEC या Election Commissioner पर लगाए गए कथित कृत्य को “official duty” का हिस्सा माना जाएगा, या वह उस सीमा से बाहर माना जाएगा?

इस सवाल का अंतिम उत्तर अदालत की व्याख्या से तय होगा।

 

तब तक आरोप अपनी जगह हैं, पुलिस शिकायत अपनी जगह, Section 16 का मौजूदा कानून अपनी जगह और न्यायिक फैसला अपनी जगह।

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