113 लाख करोड़ के कर्ज में डूबे भारतवासी,पढ़ें पूरी ख़बर

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  • संसद में चौंकाने वाला खुलासा, RBI की रेपो रेट कटौती से क्या सचमुच मिलेगी राहत?
  • संसद में पेश हुआ चौंकाने वाला डेटा

नई दिल्ली : देश में आम लोग कितने बड़े पैमाने पर कर्ज के बोझ तले दबे हैं, इसका ताज़ा आंकड़ा संसद में सामने आया। सरकार द्वारा पेश किए गए डेटा के अनुसार, भारतीयों पर कुल 113 लाख करोड़ रुपये का कर्ज है। यह आंकड़ा पिछले वर्षों की तुलना में काफी अधिक है।

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कर्ज का यह बोझ बताता है कि आम नागरिकों की आर्थिक स्थिति लगातार दबाव में है और महंगाई, बेरोज़गारी तथा बढ़ते खर्चों के कारण लोग बड़ी मात्रा में ऋण ले रहे हैं।

किस तरह का कर्ज सबसे ज्यादा?

  • 39 लाख करोड़ रुपये सिर्फ हाउसिंग लोन (होम लोन) में
  • 74 लाख करोड़ रुपये नॉन-हाउसिंग लोन में — जैसे
    • पर्सनल लोन
    • वाहन ऋण
    • क्रेडिट कार्ड देनदारी
    • शिक्षा ऋण
    • उपभोक्ता लोन

इससे साफ है कि होम लोन से भी ज्यादा लोग अपनी रोज़मर्रा ज़रूरतों व अत्यावश्यक खर्चों के लिए कर्ज़ लेने को मजबूर हैं।

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RBI की रेपो रेट में 0.25% की कटौती — क्या फर्क पड़ेगा?

रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया ने हालिया मौद्रिक समीक्षा में 0.25% (25 बेसिस पॉइंट) की कटौती की है। रेपो रेट अब 5.25% हो गया है।

किसे फायदा?

  • ज्यादातर फ्लोटिंग रेट होम लोन लेने वालों की EMI में कटौती की संभावना।
  • कार, होम और बड़े लोन पर भविष्य में ब्याज दर घट सकती है।

किसे तुरंत फायदा नहीं?

  • पर्सनल लोन
  • वाहन लोन
  • क्रेडिट कार्ड बकाया
  • शिक्षा ऋण

इन लोन का बड़ा हिस्सा fixed rate पर आधारित होता है। इसलिए 113 लाख करोड़ के कर्जदारों में से अधिकांश को अभी कोई राहत मिलने की संभावना नहीं।

कर्ज की बढ़ती समस्या — आम जनता पर असर

  • कर्ज का बढ़ता बोझ मध्यम वर्ग और युवाओं पर सबसे ज्यादा असर डाल रहा है।
  • ब्याज दरों में मामूली कटौती से तुरंत राहत संभव नहीं, क्योंकि जरूरतमंद लोग ज्यादा नॉन-हाउसिंग लोन लेते हैं।
  • पर्सनल लोन और क्रेडिट कार्ड बकाया बढ़ना आर्थिक दबाव का संकेत है।
  • EMI बढ़ने या आय स्थिर रहने से डिफॉल्ट का खतरा बढ़ सकता है।

विशेषज्ञों की राय

आर्थिक जानकारों के अनुसार—

  • अर्थव्यवस्था में मंदी और महंगाई के बीच लोग नकदी संकट झेल रहे हैं।
  • कर्ज बढ़ना परिवारों की वित्तीय सेहत के लिए चिंता का विषय है।
  • RBI की कटौती तभी कारगर होगी जब बैंक ब्याज दरों को वास्तविक रूप से कम करें और इसका लाभ उपभोक्ताओं तक पहुंचे।

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निष्कर्ष

113 लाख करोड़ रुपए का कर्ज सिर्फ आंकड़ा नहीं, बल्कि देश की आर्थिक वास्तविकता का आईना है। RBI की रेपो रेट कटौती एक सकारात्मक कदम है, लेकिन इसके प्रभाव सीमित होंगे। करोड़ों ऐसे लोग हैं जिन्हें तत्काल कोई राहत नहीं मिलेगी।

देश की आर्थिक मजबूती के लिए उपभोक्ता कर्ज पर नियंत्रण, रोजगार सृजन और महंगाई नियंत्रण जैसी बुनियादी नीतिगत सुधार की जरूरत है।

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