लोकार्पण के चंद दिनों में बार-बार धंस रही सड़क, बारिश ने खोली निर्माण और जलनिकासी व्यवस्था की पोल
उन्नाव/लखनऊ। कानपुर-लखनऊ एक्सप्रेसवे की चमकदार तस्वीरों के पीछे अब सड़क की गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। करीब 4700 करोड़ रुपये की लागत से तैयार इस महत्वाकांक्षी छह लेन एक्सप्रेसवे पर लोकार्पण के कुछ ही दिनों बाद लगातार सड़क धंसने, दरारें आने और जलभराव की शिकायतें सामने आ रही हैं। रविवार को बारिश के बाद असोहा क्षेत्र में कई स्थानों पर सड़क धंसने की सूचना सामने आई, जबकि सोमवार को भी एक्सप्रेसवे पर करीब 10 स्थानों पर सड़क धंसने की रिपोर्ट सामने आई है।
सबसे चिंता की बात यह है कि यह समस्या किसी एक स्थान तक सीमित नहीं रह गई है। इससे पहले भी एक्सप्रेसवे पर अलग-अलग स्थानों पर सड़क धंसने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक, लोकार्पण के महज 25 दिनों के भीतर 53 स्थानों पर सड़क धंसने की बात सामने आई और मामले की तकनीकी जांच के लिए एनआईटी की टीम को लगाया गया है।
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बारिश आते ही सामने आई निर्माण की खामियां
बारिश के बाद एक्सप्रेसवे की स्थिति ने सबसे ज्यादा सवाल पानी की निकासी को लेकर खड़े किए हैं। कई स्थानों पर पानी जमा होने और सड़क के किनारों तथा सतह के कमजोर होने की तस्वीरें सामने आई हैं। रिपोर्टों में जलनिकासी के पर्याप्त इंतजाम नहीं होने को सड़क धंसने की संभावित वजहों में शामिल किया गया है।
यानी जिस एक्सप्रेसवे को तेज, सुरक्षित और आधुनिक सफर का प्रतीक बताया गया था, वहां मानसून की शुरुआती मार ने ही निर्माण गुणवत्ता और इंजीनियरिंग व्यवस्था की परीक्षा ले ली है।
21 दिन में चार जगह धंसी, फिर बढ़ता गया आंकड़ा
एक्सप्रेसवे पर सड़क धंसने का सिलसिला लगातार बढ़ता गया। पहले 21 दिनों में चार स्थानों पर सड़क धंसने की खबर आई थी। इसके बाद भी अलग-अलग स्थानों से सड़क के क्षतिग्रस्त होने की सूचनाएं सामने आती रहीं।
6 अगस्त को सामने आई रिपोर्टों में एक्सप्रेसवे पर गड्ढों और क्षतिग्रस्त हिस्सों की मरम्मत के दौरान पंखों से सतह सुखाने तक की तस्वीरें चर्चा में रहीं। इससे एक्सप्रेसवे की निर्माण गुणवत्ता को लेकर सोशल मीडिया से लेकर आम लोगों के बीच भी सवाल उठे।
आखिर इतनी जल्दी क्यों धंस रही सड़क?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि करोड़ों रुपये की लागत से तैयार सड़क इतनी जल्दी क्यों जवाब दे रही है?
विशेषज्ञ जांच में कई बिंदुओं की पड़ताल जरूरी होगी—
सड़क की मिट्टी और सबग्रेड की गुणवत्ता, निर्माण के दौरान की गई कंपैक्शन, जलनिकासी व्यवस्था, इस्तेमाल की गई निर्माण सामग्री, बारिश के पानी के प्रवाह का आकलन और निर्माण के बाद गुणवत्ता जांच।
चूंकि परियोजना EPC/HAM जैसे अनुबंधीय ढांचे में अलग-अलग पैकेजों में तैयार हुई है, इसलिए जिम्मेदारी तय करने के लिए तकनीकी रिकॉर्ड, गुणवत्ता परीक्षण और साइट निरीक्षण रिपोर्टों की जांच अहम होगी। सरकारी दस्तावेजों में परियोजना को लगभग 63 किलोमीटर लंबा छह लेन का एक्सेस-कंट्रोल्ड एक्सप्रेसवे बताया गया है और इसकी अनुमानित लागत करीब 4700 करोड़ रुपये दर्ज है।
NIT जांच से खुलेगा राज
लगातार सड़क धंसने की घटनाओं के बाद अब तकनीकी जांच पर निगाहें टिकी हैं। एनआईटी टीम द्वारा जांच शुरू किए जाने की रिपोर्ट सामने आई है।
जांच में यदि निर्माण सामग्री, डिजाइन, जलनिकासी, मिट्टी की गुणवत्ता या निर्माण प्रक्रिया में खामी सामने आती है तो जिम्मेदारी तय करने और संबंधित एजेंसियों पर कार्रवाई का रास्ता साफ हो सकता है।
जनता के पैसे का सवाल भी बड़ा
यह केवल सड़क के टूटने या धंसने का मामला नहीं है। इसके पीछे हजारों करोड़ रुपये की सार्वजनिक धनराशि लगी है और लोगों को उम्मीद थी कि नया एक्सप्रेसवे वर्षों तक सुरक्षित और सुगम यातायात उपलब्ध कराएगा।
लेकिन उद्घाटन के कुछ ही सप्ताह बाद बार-बार मरम्मत की जरूरत पड़ना अपने आप में गंभीर विषय है। सवाल यह भी है कि क्या निर्माण पूरा होने से पहले गुणवत्ता की पर्याप्त जांच हुई थी? क्या जलनिकासी व्यवस्था का मानसून से पहले परीक्षण किया गया था? और अगर कमियां थीं तो उन्हें उद्घाटन से पहले क्यों नहीं पकड़ा गया?
अब जरूरत केवल धंसी सड़क को दोबारा भर देने की नहीं, बल्कि मूल कारण तलाशने और जिम्मेदारी तय करने की है।
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- क्योंकि जनता को ऐसा एक्सप्रेसवे नहीं चाहिए जिसकी पहचान उसकी रफ्तार से ज्यादा उसकी बार-बार होने वाली मरम्मत से बने।


