- पत्रकारिता से शुरू हुआ जीवन, जेपी आंदोलन से जुड़ाव और 14 पूर्व सैनिकों के साथ रखी SIS ग्रुप की नींव
- राजनीति और उद्योग जगत में बनाई अलग पहचान
अभिजीत झा
नई दिल्ली/पटना। देश के जाने-माने उद्योगपति, भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व राज्यसभा सांसद डॉ. रविंद्र किशोर सिन्हा का शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026 को नोएडा स्थित उनके आवास पर निधन हो गया। वह करीब 75 वर्ष के थे। उनके निधन की खबर से राजनीतिक और उद्योग जगत में शोक की लहर है। एक साधारण परिवार से निकलकर पत्रकारिता, राजनीति और कारोबार की दुनिया में अपनी पहचान बनाने वाले आरके सिन्हा का जीवन संघर्ष, संकल्प और उद्यमशीलता की मिसाल रहा।
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22 सितंबर 1951 को बिहार के बक्सर में जन्मे रविंद्र किशोर सिन्हा का शुरुआती जीवन आर्थिक चुनौतियों के बीच बीता। परिवार की जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने शिक्षा जारी रखी और कम उम्र में ही रोजगार की तलाश शुरू कर दी। वर्ष 1971 में उन्होंने पटना के अंग्रेजी अखबार ‘सर्चलाइट’ में पत्रकारिता की शुरुआत की। उस समय उन्हें महज 250 रुपये मासिक वेतन मिलता था। बाद में उन्होंने ‘प्रदीप’ अखबार में भी काम किया।
युद्ध की रिपोर्टिंग से जेपी आंदोलन तक, पत्रकारिता में भी रहा संघर्ष
पत्रकारिता के दौरान आरके सिन्हा ने देश के कई महत्वपूर्ण घटनाक्रमों को करीब से देखा। वर्ष 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध और बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान उन्होंने युद्ध संवाददाता के रूप में भी काम किया। इस दौरान उन्हें भारतीय सैनिकों के जीवन, उनके संघर्ष और सेवानिवृत्ति के बाद आने वाली चुनौतियों को समझने का अवसर मिला।
सिन्हा जयप्रकाश नारायण के विचारों से प्रभावित थे और जेपी आंदोलन से भी जुड़े। आंदोलन के समर्थन और राजनीतिक विचारों के चलते उनके अखबार प्रबंधन से मतभेद हुए और उन्हें नौकरी छोड़नी पड़ी। नौकरी छूटने के बाद उनके पास सीमित संसाधन थे। बताया जाता है कि उस समय उन्हें करीब 250 रुपये की रकम मिली थी। लेकिन उन्होंने परिस्थितियों के आगे हार नहीं मानी और एक नए रास्ते पर चलने का फैसला किया।
14 पूर्व सैनिकों से शुरू की कंपनी, अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाया कारोबार
आरके सिन्हा ने पूर्व सैनिकों को रोजगार उपलब्ध कराने के उद्देश्य से वर्ष 1974 में पटना में सिक्योरिटी एंड इंटेलिजेंस सर्विसेज (SIS) की स्थापना की। शुरुआत में उनके साथ महज 14 पूर्व सैनिक जुड़े थे। सीमित पूंजी, छोटी जगह और कुछ ग्राहकों के सहारे शुरू हुआ यह कारोबार धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा।
उस दौर में निजी सुरक्षा सेवाओं का कारोबार भारत में बहुत अधिक विकसित नहीं था। सिन्हा ने पूर्व सैनिकों के अनुभव, अनुशासन और प्रशिक्षण को अपनी कंपनी की ताकत बनाया। शुरुआत में निर्माण परियोजनाओं को सुरक्षा गार्ड उपलब्ध कराए गए। इसके बाद कंपनी को दूसरे संस्थानों से भी काम मिलने लगा।
कई चुनौतियों और आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने कंपनी का विस्तार जारी रखा। समय के साथ SIS ने सुरक्षा सेवाओं के अलावा कैश मैनेजमेंट, फैसिलिटी मैनेजमेंट और इलेक्ट्रॉनिक सिक्योरिटी जैसे क्षेत्रों में भी कदम रखा। वर्ष 2008 में कंपनी ने ऑस्ट्रेलिया के सुरक्षा कारोबार में बड़ा अधिग्रहण किया। वर्ष 2017 में SIS शेयर बाजार में सूचीबद्ध हुई। इस तरह एक छोटी शुरुआत अंतरराष्ट्रीय कारोबारी पहचान में बदल गई।
जनसंघ से भाजपा तक का सफर, छह साल रहे राज्यसभा सांसद
कारोबार के साथ आरके सिन्हा का राजनीतिक सफर भी लगातार आगे बढ़ता रहा। वर्ष 1966 में पंडित दीनदयाल उपाध्याय के संपर्क में आने के बाद वह भारतीय जनसंघ से जुड़े। बाद में भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक सदस्यों में शामिल हुए। उन्होंने संगठन में कई जिम्मेदारियां निभाईं और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ काम किया।
वर्ष 2014 में भाजपा ने उन्हें बिहार से राज्यसभा भेजा। वह 10 अप्रैल 2014 से 9 अप्रैल 2020 तक राज्यसभा के सदस्य रहे। अपने संसदीय कार्यकाल में उन्होंने रोजगार, महिलाओं की सुरक्षा, पर्यावरण, गंगा की स्वच्छता और पूर्व सैनिकों से जुड़े मुद्दों को उठाया। उद्योग जगत में पहचान के साथ-साथ उन्होंने राजनीतिक और संसदीय गतिविधियों में भी भागीदारी निभाई।
ब्रेन स्ट्रोक के बाद बिगड़ी थी तबीयत, नोएडा में ली अंतिम सांस
आरके सिन्हा के जीवन के अंतिम वर्षों में स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां भी सामने आईं। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, जनवरी 2025 में उन्हें ब्रेन स्ट्रोक आया था। इसके बाद उनकी हालत गंभीर हो गई और वह लंबे समय तक कोमा में रहे। शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026 को नोएडा स्थित उनके आवास पर उनका निधन हो गया।
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परिवार की ओर से निधन की सूचना दी गई। उनका पार्थिव शरीर पटना लाए जाने और पाटलिपुत्र स्थित अन्नपूर्णा भवन में अंतिम दर्शन की व्यवस्था किए जाने की जानकारी सामने आई है।
250 रुपये से शुरू हुई कहानी छोड़ गई बड़ी विरासत
आरके सिन्हा का जीवन इस बात का उदाहरण है कि सीमित संसाधनों के बावजूद दृढ़ इच्छाशक्ति और मेहनत से बड़ी मंजिल हासिल की जा सकती है। पत्रकारिता में 250 रुपये की नौकरी से शुरुआत करने वाले सिन्हा ने 14 पूर्व सैनिकों के साथ एक ऐसी कंपनी की नींव रखी, जिसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई।
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राजनीति में जनसंघ से भाजपा तक का सफर और राज्यसभा में बिहार का प्रतिनिधित्व उनकी सार्वजनिक जीवन की महत्वपूर्ण उपलब्धियां रहीं। उनके निधन से उद्योग और राजनीतिक जगत ने एक ऐसे व्यक्ति को खो दिया, जिसकी पहचान पत्रकार, उद्यमी और राजनेता—तीनों रूपों में रही।
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नेशन स्टेशन न्यूज़ परिवार की ओर से दिवंगत डॉ. रविंद्र किशोर सिन्हा को भावभीनी श्रद्धांजलि।



