क्या अमीरों तक ही सिमट जाएंगे सरकार के बड़े स्वास्थ्य संस्थान?

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  • गरीब मरीजों को किया जा रहा है रेफर, सवालों के घेरे में व्यवस्था
लखनऊ / रायबरेली।
देश और प्रदेश के सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों को “जनता के लिए जन अस्पताल” कहा जाता है, लेकिन अब यह सवाल तेजी से उठ रहा है —
क्या ये संस्थान अमीरों और वीआईपी वर्ग तक ही सीमित हो गए हैं?
क्योंकि रायबरेली एम्स, लखनऊ का SGPGI, KGMU और लोहिया संस्थान जैसे बड़े अस्पतालों से गरीब मरीजों को लगातार रेफर किया जा रहा है।
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 रायबरेली एम्स में गरीबों को इलाज के बजाय “रेफर स्लिप”
रायबरेली के एम्स को इस क्षेत्र के ग्रामीण जिलों — अमेठी, प्रतापगढ़, सुल्तानपुर और उन्नाव — के मरीजों के लिए “आशा की किरण” कहा गया था।
लेकिन अब वहां भी गरीब और सामान्य मरीजों को यह कहकर लौटा दिया जा रहा है कि “बेड उपलब्ध नहीं” या “सुविधा सीमित है।”
स्थानीय लोगों का आरोप है कि कई बार एम्स में मौजूद अधिकारी वीआईपी या सिफारिश वाले मरीजों को प्राथमिकता देते हैं, जबकि सामान्य मरीजों को किसी अन्य सरकारी अस्पताल या निजी संस्थान के लिए रेफर कर दिया जाता है।
रायबरेली निवासी रामभवन मौर्य बताते हैं 
“हम अपनी पत्नी को लेकर रायबरेली एम्स पहुंचे थे। डॉक्टर ने कहा कि यहां हार्ट केस की सुविधा नहीं है, लखनऊ SGPGI चले जाइए। दो दिन का चक्कर काटने के बाद हम प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराए।”
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सरकार का सस्ता श्रम या युवाओं का शोषण? 

क्या कहता है संवैधानिक कानून
रायबरेली एम्स जैसे संस्थान गरीबों की उम्मीद का केंद्र हैं।
अगर वही संस्थान सिफारिश और पहुँच वाले मरीजों तक सीमित रह जाएँ, तो “स्वास्थ्य समानता” की परिकल्पना अधूरी रह जाएगी।
सरकार को चाहिए कि रेफरल सिस्टम को डिजिटल, पारदर्शी और जिम्मेदार बनाए, ताकि कोई भी गरीब इलाज के अभाव में अपनी जान न गंवाए।
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