सीपी इंटरनेशनल स्कूल में ग्रैंडपेरेंट-टीचर मीटिंग का भव्य आयोजन

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  • नन्हे-मुन्ने बच्चों की सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने मोहा मन
  • बुजुर्गों के सम्मान और संस्कारों पर दिया जोर

मोहम्मद इसरार, जिला संवाददाता

फर्रुखाबाद। सीपी इंटरनेशनल स्कूल में दादा-दादी और नाना-नानी के सम्मान में ग्रैंडपेरेंट-टीचर मीटिंग (जीटीएम) का भव्य आयोजन किया गया। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य बच्चों के जीवन में बुजुर्गों के अनुभव, मार्गदर्शन और संस्कारों के महत्व को रेखांकित करना रहा। इस दौरान नन्हे-मुन्ने बच्चों की मनमोहक सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने उपस्थित अतिथियों और परिजनों का दिल जीत लिया।

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कार्यक्रम की शुरुआत बच्चों की रंगारंग प्रस्तुतियों से हुई। विद्यार्थियों ने नृत्य, गीत और नाटिकाओं के माध्यम से अपने दादा-दादी और नाना-नानी के प्रति प्रेम, सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त की। बच्चों की प्रस्तुतियों पर उपस्थित लोगों ने तालियों के साथ उत्साहवर्धन किया।

विद्यालय के डायरेक्टर डॉ. मिथिलेश अग्रवाल ने कहा कि बच्चों के सर्वांगीण विकास में माता-पिता के साथ-साथ दादा-दादी और नाना-नानी की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। बुजुर्ग परिवार की मजबूत नींव हैं, जो अपने अनुभवों के माध्यम से बच्चों को सही दिशा और नैतिक मूल्यों की सीख देते हैं।

डिप्टी डायरेक्टर श्रीमती अंजू राजे ने कहा कि इस तरह के आयोजनों से बच्चों में बड़ों के प्रति आदर, प्रेम और पारिवारिक मूल्यों की भावना मजबूत होती है। ऐसे कार्यक्रम नई पीढ़ी को अपने परिवार और संस्कारों से जोड़ने का प्रभावी माध्यम हैं।

प्रधानाचार्य श्री पीरथ ने अपने संबोधन में कहा कि आधुनिक शिक्षा के साथ बच्चों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़े रखना भी आवश्यक है। ग्रैंडपेरेंट्स अपने अनुभव और स्नेह से बच्चों का मार्गदर्शन करते हैं, जिससे उनमें बेहतर नागरिक बनने के गुण विकसित होते हैं।

कार्यक्रम के समापन पर उप प्रधानाचार्य श्री नवीन शाक्य ने सभी अतिथियों और परिजनों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि बुजुर्गों की गरिमामयी उपस्थिति और आशीर्वाद ने आयोजन को यादगार बना दिया। इसके बाद शिक्षकों और परिजनों के बीच बच्चों के सर्वांगीण विकास, शिक्षा और संस्कारों को लेकर सकारात्मक चर्चा हुई।

अंत में उपस्थित बुजुर्गों ने विद्यालय की इस पहल की सराहना की। कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में आधुनिक शिक्षा के साथ पारिवारिक संस्कार और बुजुर्गों का मार्गदर्शन भी बेहद महत्वपूर्ण है।

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